महिला वकील के मामले में पुलिस के पक्ष में आया फैसला, 2 लाख क्षतिपूर्ति का आदेश निरस्त

भोपाल | महिला अधिवक्ता वीणा गौतम का नाम पुलिस की 'गुंडा सूची' (गुंडा एक्ट) में दर्ज किए जाने और उनके खिलाफ की गई निवारक कानूनी कार्रवाई के मामले में पुलिस अधिकारियों को जिला अदालत से एक बड़ी राहत मिली है। न्यायाधीश अजय पेंदाम की अदालत ने निचली अदालत के उस पूर्व फैसले को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है, जिसमें पुलिस अधिकारियों पर 2 लाख रुपये की आर्थिक क्षतिपूर्ति (हर्जाना) लगाई गई थी।

जिला अदालत ने अपने स्पष्ट फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति के पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड को आधार बनाकर पुलिस द्वारा की गई निवारक कार्रवाई को केवल इस आधार पर दुर्भावनापूर्ण नहीं माना जा सकता कि बाद में एसडीएम न्यायालय ने संबंधित प्रकरण को खारिज कर दिया था। अदालत के अनुसार, केवल मामला निरस्त हो जाने मात्र से स्वतः ही क्षतिपूर्ति या हर्जाने का कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता।

वर्ष 2020 का पूरा मामला और अदालती पृष्ठभूमि

यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 2020 का है। महिला अधिवक्ता वीणा गौतम ने आरोप लगाया था कि उस दौरान तत्कालीन थाना प्रभारी और संबंधित उपनिरीक्षक ने उनके खिलाफ द्वेषपूर्ण भावना से ग्रस्त होकर एक झूठा इस्तगासा तैयार किया था। इसके तहत पुलिस ने 22 सितंबर 2020 को कार्रवाई करते हुए उनका नाम गुंडा सूची में क्रम संख्या 721 पर दर्ज कर दिया था और पूरा मामला एसडीएम नजूल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था।

इसके बाद, एसडीएम कोर्ट ने 3 दिसंबर 2021 को इस प्रकरण को सुनवाई के योग्य न मानते हुए निरस्त कर दिया था। इस आदेश के आने के बाद वीणा गौतम ने पुलिस की इस कार्रवाई से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को गहरी ठेस पहुँचने का हवाला देते हुए एक सिविल दावा पेश किया था, जिसमें 2 लाख रुपये के हर्जाने की माँग की गई थी। निचली अदालत ने उनके इस दावे को स्वीकार करते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया था। निचली अदालत के इसी फैसले के खिलाफ पुलिस अधिकारियों ने जिला अदालत में अपील दायर की थी।

तीन पुराने आपराधिक मामलों को बनाया गया था आधार

जिला अदालत के समक्ष सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि अधिवक्ता वीणा गौतम के खिलाफ राजधानी के ऐशबाग थाने में पहले से ही तीन आपराधिक मामले दर्ज थे। पुलिस ने इन्हीं पुराने मामलों को आधार बनाते हुए उनका नाम गुंडा सूची में शामिल किया था और निवारक कार्रवाई के तहत प्रकरण एसडीएम कोर्ट को भेजा था।

हालाँकि उस समय एसडीएम कोर्ट ने उन्हें आदतन अपराधी न मानते हुए मामले को खारिज कर दिया था, लेकिन जिला अदालत ने यह स्पष्ट किया कि एसडीएम कोर्ट का वह निर्णय इस बात का अकाट्य प्रमाण नहीं है कि पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी।

निचली अदालत का हर्जाने का आदेश रद्द

जिला अदालत ने इन्हीं वैधानिक तर्कों के आधार पर पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध निचली अदालत द्वारा सुनाए गए 2 लाख रुपये के हर्जाने के आदेश को खारिज कर दिया। इस फैसले का मुख्य विधिक आधार यह रहा कि किसी भी निवारक प्रकरण का बाद में निरस्त होना मात्र इस बात को साबित नहीं करता कि पुलिस ने अपने पदीय कर्तव्यों का निर्वहन करते समय कोई दुर्भावनापूर्ण या अवैध मंша रखी थी।

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