Friday, June 26, 2026
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चूहों से फैलने वाले वायरस के खिलाफ वैक्सीन पर काम अंतिम चरण में

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क्रूज शिप 'एमवी होंडियस' में फैले हंतावायरस (Hantavirus) संक्रमण ने वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। चूहों के जरिए फैलने वाली इस जानलेवा बीमारी से अब तक तीन यात्रियों की मौत हो चुकी है। संक्रमण के डर के बीच, स्वास्थ्य अधिकारी उन दर्जनों यात्रियों की तलाश कर रहे हैं जो 24 अप्रैल को सेंट हेलेना द्वीप पर उतरे थे, ताकि वायरस के प्रसार को रोका जा सके।

वैक्सीन की दिशा में बड़ी कामयाबी

हंतावायरस का अब तक कोई सटीक इलाज या टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन जल्द ही यह स्थिति बदलने वाली है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैज्ञानिकों की एक टीम इस घातक वायरस के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने के अंतिम चरण में है। इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के शोधकर्ताओं ने 'हंतीन डिजीज' (हंतावायरस समूह की बीमारी) के खिलाफ एक नया एंटीजन तैयार किया है। लैब और जानवरों पर किए गए शुरुआती परीक्षणों के परिणाम काफी उत्साहजनक रहे हैं।

विशेषज्ञों की राय: सुरक्षा की नई उम्मीद

प्रोजेक्ट से जुड़ी प्रोफेसर एसेल सार्टबाएवा ने बताया कि हंतावायरस का टीका बनना चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे न केवल बीमारी को फैलने से रोका जा सकेगा, बल्कि मृत्यु दर में भी भारी कमी आएगी। वर्तमान में इस वायरस से संक्रमित 40 प्रतिशत मरीजों की जान जाने का खतरा रहता है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर फ्लू या कोविड जैसे लगते हैं, जिससे इलाज में देरी हो जाती है।

क्या है हंतावायरस और यह कितना खतरनाक?

  • संक्रमण का स्रोत: यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित चूहों के मल, मूत्र या लार के संपर्क में आने से फैलता है। पुराने गोदाम, बंद कमरे या गंदगी वाले स्थानों पर इसका जोखिम अधिक होता है।

  • प्रभाव: यह शरीर में पहुँचकर फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं और किडनी को गंभीर नुकसान पहुँचाता है।

  • महामारी का खतरा: विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोविड-19 की तरह हवा के जरिए तेजी से नहीं फैलता, इसलिए इससे वैश्विक महामारी की आशंका कम है। हालांकि, इसकी उच्च मृत्यु दर इसे बेहद खतरनाक बनाती है।

अन्य टीके भी कतार में

यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वायरोलॉजिस्ट जे हूपर और उनकी टीम भी 'एंडीज वायरस' (हंतावायरस का एक प्रकार) के लिए डीएनए वैक्सीन पर काम कर रही है। पहले चरण के मानव परीक्षणों में 80 प्रतिशत प्रतिभागियों में वायरस से लड़ने वाली एंटीबॉडी विकसित हुई हैं।