मंगाली गांव की बेटियों का कमाल, 100 से ज्यादा नेशनल प्लेयर और 8 ने पहनी भारतीय टीम की जर्सी

हिसार। वैश्विक स्तर पर खेल के बड़े आयोजनों को लेकर जहाँ दुनिया भर में जबरदस्त उत्साह और चर्चाओं का दौर चलता रहता है, वहीं हरियाणा का एक छोटा सा गांव खेल संस्कृति की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ फुटबॉल का जुनून किसी खास टूर्नामेंट या समय का मोहताज नहीं है, बल्कि यह यहाँ की रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

भोर की पहली किरण के साथ मैदान पर गूंजती है कोच की सीटी

हिसार जिले के मंगाली आकलां गांव में कदम रखते ही खेल के प्रति एक अलग ही समर्पण देखने को मिलता है। यहाँ सूरज उगने से काफी पहले ही खेल के मैदान में हलचल शुरू हो जाती है। कोच की सीटी की आवाज के साथ ही हर उम्र की बेटियां मैदान में पसीना बहाने उतर पड़ती हैं। फुटबॉल को अपनी किस्मत मान चुकी ये खिलाड़ी सुबह-सुबह मैदान पर गेंद के साथ ड्रिबलिंग और पासिंग का कड़ा अभ्यास करती नजर आती हैं, जिससे पूरा माहौल खेल के रंग में रंगा हुआ महसूस होता है।

दो दशकों की कड़ी मेहनत ने बदल दी ग्रामीण अंचल की तस्वीर

यह खेल मैदान पिछले लगभग बाईस वर्षों से इस गांव के सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा गवाह रहा है। दो दशक पहले शुरू हुई खेल की एक छोटी सी मुहिम आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुकी है। इस समय अवधि के दौरान यहाँ की बेटियों ने अपनी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर सौ से अधिक पदक जीतकर गांव का नाम रोशन किया है। यह खेल मैदान न केवल खिलाड़ियों को तराश रहा है, बल्कि रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़कर महिलाओं को आगे बढ़ने के नए अवसर भी दे रहा है।

उजाड़ और कटीली जमीन पर तैयार हुआ देश की प्रतिभाओं का मंच

जिस जमीन पर आज बेटियां देश के लिए खेलने का ख्वाब बुन रही हैं, उसका इतिहास काफी संघर्षपूर्ण रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि इस जगह पर कभी कंटीली झाड़ियां हुआ करती थीं और बुजुर्ग इसे एक पुराने कब्रिस्तान के रूप में जानते थे। लेकिन ग्रामीणों और खेल प्रेमियों के दृढ़ संकल्प ने इस बंजर और उपेक्षित भूमि का कायाकल्प कर दिया। आज वही उजाड़ जमीन एक शानदार खेल मैदान में तब्दील हो चुकी है, जहाँ से निकलकर बेटियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं।

भारतीय टीम का सफर और खेल कोटे से मिला सरकारी नौकरियों का तोहफा

इस मैदान से निकले खिलाड़ियों की सफलता के आंकड़े बेहद प्रेरणादायक हैं। यहाँ की बेहतरीन ट्रेनिंग की बदौलत अब तक आठ बेटियां भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की जर्सी पहनकर देश का गौरव बढ़ा चुकी हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, खेल के प्रति इस निष्ठा ने खिलाड़ियों को आत्मनिर्भर भी बनाया है, जिसके चलते गांव के 41 प्रतिभावान खिलाड़ियों को खेल कोटे के अंतर्गत विभिन्न सरकारी विभागों में सम्मानजनक नौकरियां हासिल हुई हैं।

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