जाट आरक्षण केस में 17 आरोपियों को मिली राहत, कोर्ट ने संदेह के आधार पर किया बरी

हिसार। वर्ष 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग-10 पर सड़क जाम करने और तोड़फोड़ करने के मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMIC) अभिषेक गर्ग की अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 17 आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

2016 का है मामला, दर्ज हुई थी एफआईआर

अग्रोहा थाना पुलिस ने 20 फरवरी 2016 को अग्रोहा चौक पर राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध करने और वाहनों की आवाजाही बाधित करने के आरोप में मामला दर्ज किया था। घटना में 100 से 150 लोगों के शामिल होने का दावा किया गया था, जिनमें से 17 लोगों को नामजद कर आरोपी बनाया गया था। इन पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं सहित सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

इन 17 लोगों को मिला संदेह का लाभ

अदालत से बरी होने वालों में जगबीर, झाबर, मणीराम, जगदीश, सचिन पवार, प्रदीप, राजेश पहाड़ी, संजय, ओम प्रकाश, रमेश, सुरेश कुमार, सुल्तान, अनिल गोदारा, राम निवास, अमित ढाका, सुरेंद्र और एक अन्य जगदीश शामिल हैं।

बरी करने के मुख्य कानूनी आधार

  • पहचान का अभाव: घटना में शामिल भीड़ में से आरोपियों की पहचान को लेकर पेश की गई तस्वीरें कानून के मानकों पर खरी नहीं उतरीं।

  • मुकरे गवाह: मामले से जुड़े कई स्वतंत्र गवाह अपने बयानों से पलट गए और अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया।

  • सबूतों की कमी: सरकारी संपत्ति को पहुंचे नुकसान की सीमा और प्रकृति साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

  • प्रक्रियात्मक चूक: पंजाब पुलिस नियम 1934 के तहत पुलिस अधिकारियों के मौके पर पहुंचने की अनिवार्य डीडी (DD) एंट्री रिकॉर्ड में नहीं पाई गई।

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