चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामलों के निष्पादन को लेकर एक बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। इस पूरे घटनाक्रम और अदालत के निर्णय को निम्नलिखित चार प्रमुख उप-शीर्षकों के माध्यम से समझा जा सकता है:
हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता अवार्ड को लागू कराने के लिए कार्यवाही केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं रह सकती जहां अवार्ड पारित किया गया हो। अदालत ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए चंडीगढ़ की अदालत में चल रही एग्जीक्यूशन कार्यवाही को पूरी तरह वैध ठहराया है।
संपत्तियों और बैंक खातों का क्षेत्राधिकार
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि यदि ऋणी की संपत्ति या बैंक खाते किसी अन्य स्थान पर भी मौजूद हैं, तो वहां की सक्षम अदालत में भी निष्पादन याचिका दायर की जा सकती है। इसी आधार पर चंडीगढ़ में केंद्र सरकार की संपत्तियां और बैंक खाते होने के कारण वहां याचिका को विधिसम्मत माना गया।
अनुबंध विवाद और पटना मध्यस्थता
यह पूरा कानूनी विवाद केंद्र सरकार और एम एस त्रिवेणी कंस्ट्रक्शन के बीच अनुबंध के उल्लंघन से उत्पन्न हुआ था। इस मामले की मध्यस्थता पटना में संपन्न हुई थी और कंपनी के पक्ष में आर्बिट्रेशन अवार्ड पारित किया गया था, जिसके खिलाफ पटना की अदालत में आपत्तियां भी लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि आर्बिट्रेशन अवार्ड किसी विशेष अदालत की डिक्री नहीं होता है। देश में किसी भी ऐसी अदालत में इसका निष्पादन संभव है जहां ऐसी डिक्री को लागू कराया जा सके।

