अंबिकापुर| छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के ग्रामीण इलाकों में पिछले कुछ महीनों से एक आक्रामक जंगली हाथी के आतंक ने स्थानीय लोगों को दो दशक पुराने उन खौफनाक दिनों की याद दिला दी है, जब क्षेत्र में नक्सलियों के भय के कारण लोग शाम ढलते ही अपने घरों में दुबक जाते थे। सरगुजा संभाग के बलरामपुर और सूरजपुर जिलों के जंगलों में अकेले विचरण कर रहे इस हाथी ने अब तक लगभग 10 निर्दोष लोगों को कुचलकर मौत के घाट उतार दिया है।
इस भयंकर वन्यजीव संघर्ष और ग्रामीणों में लगातार सुलगते आक्रोश को देखते हुए स्थानीय वन मंडल अधिकारी (DFO) ने राज्य शासन को पत्र भेजकर इस खतरनाक हाथी को ट्रेंकुलाइज कर सुरक्षित रेस्क्यू सेंटर में भेजने की मांग की है। वन विभाग का मानना है कि यदि इस समस्या का त्वरित समाधान नहीं किया गया, तो एक तरफ जहाँ लगातार आम नागरिकों की जान जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आक्रोशित ग्रामीणजंस करंट या अन्य तरीकों से हाथी को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
तोर पर आक्रामक हो चुका है अकेला जंगली हाथी
सरगुजा संभाग के विभिन्न वन क्षेत्रों में घूम रहा यह अकेला हाथी अब बेहद आक्रामक रुख अपना चुका है। स्थिति यह है कि इसे देखते ही वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों के भी होश उड़ जाते हैं, क्योंकि यह सामने आते ही सीधा हमला कर रहा है। सूरजपुर, बलरामपुर और सरगुजा जिलों के अंतर्गत आने वाले कई गाँवों में इस हाथी ने अब तक 10 लोगों की जान ले ली है।
हाल ही में, गत 29 सितंबर की शाम करीब 6:00 बजे बलरामपुर जिले के राजपुर वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत 'परसवर कला' में इस हाथी ने एक स्थानीय ग्रामीण को उस वक्त कुचलकर मार डाला, जब वह अपने घर से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित दूसरे मोहल्ले में अपनी बेटी के घर जा रहा था। इस दौरान मृतक की पत्नी भी पीछे-पीछे आ रही थी, जिन्होंने बमुश्किल भागकर अपनी जान बचाई। आसपास मौजूद अन्य ग्रामीण भी जान बचाकर इधर-उधर भागे, तब जाकर उनकी रक्षा हो सकी।
कई परिवारों को उजाड़ चुका है यह खूंखार हाथी
पिछले कुछ महीनों के भीतर परसवर कला, शिवपुर, रेवतपुर और कल्याणपुर जैसे तमाम गाँवों में इस हाथी ने कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया है। इस भयानक दहशत के कारण किसानों और ग्रामीणों का अपने खेतों, मवेशियों को चराने जंगलों की ओर जाना पूरी तरह से ठप हो गया है। स्थानीय प्रशासन और वन विभाग फिलहाल अपने मैदानी अमले और 'हाथी मित्रों' के भरोसे किसी तरह हाथियों की निगरानी करने का प्रयास कर रहा है, परंतु इसके बावजूद लगातार हो रही मौतों से त्रस्त ग्रामीण अब इस हाथी को तुरंत पकड़कर क्षेत्र से दूर ले जाने की पुरजोर माँग कर रहे हैं।
इसके अलावा, हालिया घटनाओं के क्रम में पिछले 24 घंटों के भीतर सरगुजा संभाग में हाथियों द्वारा कुचले जाने के कारण दो और लोगों की जान चली गई है। एक अन्य घटना में सूरजपुर जिले के चंदोरा थाना क्षेत्र अंतर्गत आने वाले दरहोरा गाँव में 'प्रमोद राजवाड़े' नामक युवक को एक हाथी ने धान के खेत में अचानक घेरकर कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।
हाथी को ट्रेंकुलाइज करने की जटिल और सुरक्षित प्रक्रिया (प्रोटोकॉल)
ग्रामीणों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वन विभाग इस आक्रामक हाथी को ट्रेंकुलाइज (बेहोश या शांत) करने की योजना बना रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, किसी जंगली हाथी को ट्रेंकुलाइज करना एक अत्यधिक तकनीकी, जोखिम भरा और केवल प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा किया जाने वाला कार्य है। वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत बिना सरकारी अनुमति और प्रमाणित वन्यजीव पशु चिकित्सक (Veterinarian) के ऐसा करना पूरी तरह से गैरकानूनी और घातक हो सकता है।
इस पूरी प्रामाणिक बचाव प्रक्रिया (रेस्क्यू प्रोटोकॉल) के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:
विशेषज्ञ टीम का गठन: इसमें मुख्य वन्यजीव पशु चिकित्सक, वरिष्ठ वन अधिकारी, कुशल शार्पशूटर और हाथियों को संभालने में माहिर अनुभवी महावत शामिल होते हैं।
कुमकी हाथियों की सहायता: अक्सर ऐसे जंगली और उग्र हाथी को काबू में करने या घेरने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित 'कुमकी' हाथियों की मदद ली जाती है।
सुरक्षा एवं भीड़ नियंत्रण: स्थानीय पुलिस और प्रशासन के सहयोग से घटनास्थल के आसपास कड़ा पहरा और भीड़ नियंत्रण सुनिश्चित किया जाता है।
उचित दवा और खुराक का निर्धारण: हाथी के शारीरिक आकार, उम्र और उसकी मानसिक स्थिति (जैसे गुस्से या मस्ट की स्थिति) के आधार पर शामक (Sedatives) दवाओं की सटीक मात्रा तय की जाती है। इसमें आमतौर पर 'जाइलाजीन' (Xylazine) या 'इटोर्फिन' (Etorphine) जैसी शक्तिशाली दवाओं का उपयोग किया जाता है।
डार्टिंग प्रक्रिया और निगरानी: विशेष रूप से डिज़ाइन की गई प्रोजेक्टर गन (डार्ट गन) के जरिए हाथी के शरीर के भारी माँसपेशियों वाले हिस्से पर निशाना साधा जाता है। दवा का असर होने में आमतौर पर 8 से 15 मिनट का समय लगता है, जिसके बाद विशेषज्ञ दल लगातार उसकी निगरानी करता है।

