बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के नियमों को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने स्पष्ट आदेश में कहा है कि किसी भी विवाहित बेटी को सिर्फ इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह शादीशुदा है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मान लेना पूरी तरह से गलत है कि विवाह के बाद बेटी केवल अपने पति पर ही निर्भर हो जाती है। निर्भरता का वास्तविक आकलन हमेशा हर मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और ठोस सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा कानूनी विवाद 'बैंक ऑफ महाराष्ट्र' में डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत एक बैंककर्मी की आकस्मिक मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा हुआ है।
बैंक का इनकार: कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी शादीशुदा बेटी ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए विधिवत आवेदन किया था, लेकिन बैंक प्रबंधन ने यह तर्क देते हुए उसका आवेदन खारिज कर दिया कि विवाह के उपरांत महिला अपने पति पर आश्रित मानी जाएगी।
हाई कोर्ट की शरण: बैंक के इस मनमाने रवैये के खिलाफ पीड़ित महिला ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां जस्टिस संजय के. अग्रवाल की अदालत में इस महत्वपूर्ण मामले की लंबी सुनवाई हुई।
बैंक की नीति और कोर्ट का कड़ा रुख
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया गया कि बैंक की अपनी अनुकंपा नियुक्ति नीति में भी शादीशुदा बेटियों को इस अधिकार से स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया है। साथ ही, महिला ने यह भी साबित किया कि अपनी दयनीय आर्थिक परिस्थितियों के चलते वह अपने दिवंगत पिता पर पूरी तरह से निर्भर थी।
नीति का परीक्षण: मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने बैंक की नियुक्ति नीति का गहराई से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि नीति के तहत 'आश्रित परिवार के सदस्य' की परिभाषा में आश्रित बेटी का जिक्र है, और उसमें कहीं भी शादीशुदा तथा अविवाहित बेटी के बीच कोई भेदभाव या अंतर नहीं किया गया है।
कोर्ट ने माना कि बैंक ने महिला की वास्तविक आर्थिक स्थिति और उसकी निर्भरता की जांच करने की जहमत उठाए बिना, केवल उसकी वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर उसका दावा खारिज कर दिया था।
संविधान के समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है यह फैसला
सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने और चर्चित मामले (कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) के फैसले का हवाला दिया।
मनमाना रवैया: अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि केवल वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर किसी शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर करना पूरी तरह से मनमाना, अतार्किक और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) में प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों के विपरीत है।
आदेश रद्द: इन तमाम मजबूत तर्कों और कानूनी पहलुओं के आधार पर हाई कोर्ट ने बैंक द्वारा महिला के अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने वाले आदेश को पूरी तरह से अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।

