NDA Majority Number Game : संसद के आगामी मॉनसून सत्र (Monsoon Session-2026) में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक और संसदीय चुनौती संविधान संशोधन से जुड़े अहम विधेयकों को पारित कराने की होगी. सरकार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (One Nation, One Election) और परिसीमन (Delimitation) विधेयक जैसे बड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. हालांकि इन विधेयकों को पारित कराने के लिए केवल साधारण बहुमत नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. ऐसे में लोकसभा का बदलता राजनीतिक गणित सरकार और विपक्ष दोनों के लिए बेहद अहम हो गया है.
NDA Majority Number Game : संविधान संशोधन के लिए छाहिये दो-तिहाई बहुमत
संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में खास बहुमत चाहिए. इसके तहत दो प्रमुख शर्तें होती हैं.
- सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन.
- मतदान के समय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई का समर्थन.
यही वजह है कि किसी भी सांसद की अनुपस्थिति, रिक्त सीटें या राजनीतिक दलों के बदलते समीकरण विधेयक के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं.
अप्रैल में क्यों अटक गया था संविधान संशोधन?
इसी वर्ष अप्रैल में महिलाओं को आरक्षण और लोकसभा तथा विधानसभा सीटों के विस्तार से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर सरकार को बड़ा झटका लगा था.
मतदान के दौरान सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष को 230 वोट मिले. कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया था. ऐसे में विधेयक पारित होने के लिए 352 वोट आवश्यक थे, लेकिन सरकार 54 वोट कम रह गई और प्रस्ताव पारित नहीं हो सका.
इस परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि सामान्य विधेयकों पर बहुमत रखने के बावजूद संविधान संशोधन के लिए NDA के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था.
तीन महीनों में कैसे बदल गया लोकसभा का गणित?
अप्रैल के बाद देश की राजनीति में कई बड़े घटनाक्रम हुए, जिन्होंने संसद का समीकरण बदल दिया है.
टीएमसी में बड़ी टूट
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के अलग होकर नए दल नेशनल कॉमन पीपुल्स इनिशिएटिव (NCPI) में जाने और NDA को समर्थन देने के दावे ने सत्ता पक्ष की स्थिति मजबूत की है. यदि लोकसभा अध्यक्ष इस घटनाक्रम को औपचारिक मान्यता देते हैं तो NDA की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है.
शिवसेना (UBT) को झटका
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के 6 सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं, जो पहले से NDA का हिस्सा है। इससे विपक्ष की ताकत और कमजोर हुई है.
INDIA गठबंधन में दरार
कांग्रेस और डीएमके के बीच लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक तालमेल कमजोर पड़ने की खबरों ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालांकि डीएमके ने औपचारिक रूप से NDA का साथ नहीं दिया है, लेकिन मुद्दों के आधार पर समर्थन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं.
शरद पवार के रुख पर टिकी निगाहें
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और महायुति नेताओं की हालिया मुलाकातों ने राजनीतिक अटकलों को हवा दी है. हालांकि एनसीपी (एसपी) नेता सुप्रिया सुले ने इन बैठकों को सामान्य बताया है, लेकिन परिसीमन विधेयक को लेकर पार्टी का रुख विपक्ष की चिंता बढ़ा रहा है.
एनसीपी (एसपी) का कहना है कि यदि सरकार लोकसभा और विधानसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि से जुड़ा संशोधन शामिल करती है तो पार्टी इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए तैयार है. यदि भविष्य में इस मुद्दे पर समर्थन मिलता है तो विपक्ष की एकजुटता प्रभावित हो सकती है.
लोकसभा में NDA का नया नंबर गेम
लोकसभा की कुल 543 सीटों में फिलहाल 3 सीटें रिक्त हैं. ऐसे में प्रभावी सदस्य संख्या 540 मानी जा रही है.
वर्तमान राजनीतिक समीकरण के अनुसार—
- NDA के पास मूल रूप से 293 सांसद हैं.
- टीएमसी के बागी सांसदों और शिवसेना (शिंदे) में शामिल सांसदों के बाद यह संख्या लगभग 319 तक पहुंच सकती है.
- यदि डीएमके के 22 सांसद किसी विशेष विधेयक पर समर्थन देते हैं तो यह आंकड़ा 341 हो जाएगा.
- एनसीपी (एसपी) के 8 सांसदों का समर्थन मिलने पर यह संख्या 349 तक पहुंच सकती है.
- इसके अलावा वाईएसआर कांग्रेस के 4 लोकसभा सांसद भी कई मौकों पर केंद्र सरकार का समर्थन करते रहे हैं. यदि उनका समर्थन भी मिलता है तो सरकार आवश्यक आंकड़े के और करीब पहुंच सकती है.
हालांकि, प्रभावी सदस्य संख्या 540 होने की स्थिति में संविधान संशोधन के लिए 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक माना जा रहा है. ऐसे में NDA को अभी भी अतिरिक्त समर्थन जुटाने की जरूरत पड़ सकती है, या फिर मतदान के दौरान विपक्ष की अनुपस्थिति अथवा वॉकआउट जैसी परिस्थितियां भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं.
आगामी मॉनसून सत्र पर पूरे देश की नजर
परिसीमन विधेयक और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे प्रस्ताव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और संघीय ढांचे से जुड़े बड़े फैसले माने जा रहे हैं. इसलिए इन विधेयकों पर होने वाली बहस और मतदान देश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं.
संसद के मॉनसून सत्र में यह स्पष्ट होगा कि क्या केंद्र सरकार बदलते राजनीतिक समीकरणों का लाभ उठाकर संविधान संशोधन के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाती है या विपक्ष एक बार फिर संख्या बल के दम पर सरकार की राह रोकने में सफल रहता है.

