विक्रमशिला पुल ने डेढ़ महीने पहले ही पुल ने दे दिया था संकेत,चेतावनियों के बावजूद नहीं जागा प्रशासन

Vikramshila Bridge Accident :भागलपुर: कहते हैं कि बड़ी आपदाएं आने से पहले आहट जरूर देती हैं, लेकिन जब सिस्टम बहरा और प्रशासन संवेदनशून्य हो जाए, तो तबाही निश्चित है. उत्तर आर दक्षिण बिहार का लाइफ लाइन कहे जाने वाले  विक्रमशिला सेतु का ढहना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही और तकनीकी अनदेखी का जीवंत प्रमाण है.

Vikramshila Bridge Accident:डेढ़ महीने पहले ही मिल गई थी ‘चेतावनी’

विक्रमशिला सेतु ने करीब डेढ़ महीने पहले ही स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि वह बीमार है. 20-21 मार्च को जब पुल के पिलर की सुरक्षा दीवार (प्रोटेक्शन वाल) टूटकर गंगा में समा गई थी, तब वह पुल की ओर से पुकार थी कि उसे मरम्मत की जरूरत है. लेकिन अफसोस, उस समय बिहार की सियासत में मची उथल-पुथल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दिल्ली रवानगी की खबरों के बीच अफसरों ने इसे गंभीरता से लेने के बजाय ठंडे बस्ते में डाल दिया. कई मीडिया संस्थानों ने इस प्रोटेक्शन वॉल के गिरने की खबर गंभीरता से दिखाई, यहां तक की चेतवनी भी दी लेकिन समग्र सरकारी अपनी ही घुन में रमा रहा. औपचारिकता के नाम पर केवल दौरा करके छोड़ दिया गया.

अफसरों का गैर-जिम्मेदाराना तर्क: “दीवार की जरूरत ही नहीं थी”

हादसे के बाद अब उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिन्होंने डेढ़ महीने पहले निरीक्षण के नाम पर सिर्फ औपचारिकता पूरी की थी. उस वक्त अधिकारियों ने बड़ी बेशर्मी से बयान जारी किया था कि:

“प्रोटेक्शन वाल की वैसे भी कोई खास जरूरत नहीं थी, इसके बह जाने से पुल की संरचना पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सेतु पूरी तरह सुरक्षित है।”

आज पुल का ढहना उन अधिकारियों के दावों के मुंह पर एक तमाचा है. अगर उसी वक्त भारी वाहनों की आवाजाही रोककर तकनीकी जांच की गई होती, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती.

10 साल से सिर्फ ‘रंग-रोगन’,असली मरम्मत गायब

मीडिया रिपोर्ट्स और तकनीकी दस्तावेजों पर गौर करें तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है. साल 2016 के बाद से इस पुल की कोई विस्तृत तकनीकी मरम्मत नहीं कराई गई थी. पिछले एक दशक से पुल पर केवल ऊपर-ऊपर से रंग-रोगन और पैच वर्क करके खानापूर्ति की जा रही थी. पुल के जोड़ों और बेयरिंग की जो सूक्ष्म जांच होनी चाहिए थी, उसे पूरी तरह नजरअंदाज किया गया.

आधी रात को टला बड़ा नरसंहार

यह महज संयोग और ‘पुल के आखिरी संकेत’ का नतीजा था कि यह हादसा रविवार मध्य रात्रि को हुआ. गिरते समय पुल ने जो कंपन पैदा किया, उससे लोग सतर्क हो गए. यदि यह हादसा दिन के उजाले में या बिना किसी पूर्व संकेत के होता, तो मरने वालों के आंकड़ों का अनुमान लगाना मुश्किल है. सैंकड़ों लोगों की जान जा सकती थी. रात का समय होने के कारण भी कम से कम 8-10 वाहनों के गंगा में समाने की आशंका टल गई.

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अब उठ रहे हैं गंभीर सवाल 
  1. क्या उन तकनीकी विशेषज्ञों और अफसरों पर एफआईआर दर्ज होगी जिन्होंने पुल को ‘सुरक्षित’ घोषित किया था?

  2. क्या 10 साल तक मरम्मत न होने के पीछे किसी बड़े भ्रष्टाचार का खेल है?

  3. जनता की जान से खिलवाड़ करने वाले सिस्टम की जवाबदेही कब तय होगी.

विक्रमशिला सेतु का गिरना सिर्फ कंक्रीट के ढांचे का गिरना नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का टूटना है जो आम जनता अपने टैक्स के बदले सुरक्षित बुनियादी ढांचे पर करती है. अब इस बात का इंतजार रहेगा कि बिहार की नई ‘सम्राट सरकार’ इस हादसे को लेकर लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई करती है. कोई कार्रवाई भी करती है या अन्य हादसों के तरह इसे भी बायनबाजी की चादर तले ढंक दिया जाता है. यहां ये कहना आवश्यक है कि अधिकारियों का निलंबन किसी समस्या का समाधान नहीं है बल्कि उन्हीं आधिकारियों को समस्या का समाधान का जिम्मा मिलना चाहिये और समाधान ना निकलाने पर दंडात्मक और आर्थिक जुर्माना लगाना चाहिये, क्योंकि यहां मामला जान की रक्षा का है.

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