Thursday, March 12, 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मलयालम न्यूज चैनल पर केंद्र सरकार के लगाये बैन को रद्द किया

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के बैन को रद्द करते हुए केरल के मलयालम न्यजू चैनल पर लगी रोक को हटा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा लगाये गये बैन को ये कहते हुए हटा दिया है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर देश के नागरिकों के अधिकार को कुचल नहीं सकती है.  मलयालम न्यूज चैनल ने केंद्र सरकार द्वारा लगाये गये बैन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे याचिका दायर की थी.

SUPREME COURT OF INDIA
SUPREME COURT OF INDIA ON MALYALAM NEWS CHENNAL NEWS 1 TV

 राष्ट्रीय सुरक्षा के दावे हवा में नहीं कर सकते, ठोस सबूत का होना जरुरी -CJI

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने केंद्र सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दावे हवा में नहीं किये जा सकते हैं. इसे साबित करने के लिए ठोस सबूत होने चाहिये . जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे टेरर लिंक साबित हो.ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे ये साबित हो सके कि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हुई है.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि सभी तरह के इवेस्टिगेशन को खुफिया नहीं कहा जा सकता . सीजेआई चंद्रचूड़ और  जस्टिस हिमा कोहली ने संयुक्त रूप से कहा कि ‘सरकार आम नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित रखने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील दे रही है. सरकार का ये रुख कानून के राज के हिसाब से गलत है.

क्या है मलयालम न्यूज चैनल पर बैन का मामला

केरल के एक मलयालम न्यूज चैनल मीडिया वन टीवी को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने  सिक्योरिटी क्लीयरेंस देने से मना कर दिया था , इसके बाद सूचना प्रसारण मंत्रालय ने चैनल के ब्राडकास्ट लाइसेंस को रिन्यू करने से मना कर दिया था. मीडिया वन टीवी ने केरल हाईकोर्ट में 9 फरवरी को इसके खिलाफ याचिका दायर की थी , जिसे केरल हाइकोर्ट की सिंगल बेंच ने भी खारिज कर दिया था. फिर मीडिया वन टीवी ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की . याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा . केंद्र सरकार ने कोर्ट को अपना जवाब सीलबंद लिफाफे में सौंपा, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि इस तरह से सीलबंद जबाव देना तो ठीक उसी तरह है जैसे न्याय मांग रहे  याची को अकेले लड़ने के लिए अंधेरे में छोड़ देना हो. ये प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के बैन को ये कहते हुए रद्द कर दिया कि मजबूत लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र और निडर प्रेस का होना जरूरी है.

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