सुप्रीम कोर्ट Supreme Court ने शुक्रवार को दिल्ली की वायु गुणवत्ता के ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंचने के मद्देनजर स्कूलों को बंद करने या बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा पर स्थानांतरित करने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की और कहा कि वह कथित शोध या स्वतंत्र राय के बजाय ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) को रेखांकित करने वाली विशेषज्ञ सिफारिशों पर भरोसा करेगा.
स्कूल ऑनलाइन करने के पक्ष में नहीं सीजेआई
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह बच्चों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगाने को लेकर अनिच्छुक है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भौतिक कक्षाओं में शिक्षा की बेहतर गुणवत्ता होती है और ऑनलाइन शिक्षा की ओर बढ़ने के परिणामों, जिसमें असमान पहुंच भी शामिल है, पर विचार करना होगा.
बेंच ने कहा, “हम बच्चों के स्कूल जाने पर रोक नहीं लगाना चाहते क्योंकि ऑनलाइन एक्सेस की वकालत करना एक बात है, लेकिन ऑनलाइन एजुकेशन तक एक्सेस और एजुकेशन देने की क्वालिटी, ये सब एक सवालिया मुद्दा है,” पीठ ने कहा, शारीरिक उपस्थिति के साथ कक्षा में शिक्षा की गुणवत्ता निश्चित रूप से बेहतर होगी.
बेंच ने डिजिटल डिवाइड पर भी ध्यान दिलाया, और चेतावनी दी कि ऑनलाइन क्लास में पूरी तरह से बदलाव बच्चों के बीच मौजूदा असमानता को और बढ़ा सकता है, खासकर उन बच्चों के बीच जिनके पास डिवाइस, भरोसेमंद इंटरनेट कनेक्टिविटी या घर पर सीखने का सही माहौल नहीं है. इसने कहा कि इस कदम से खास अधिकार वाले और कम अधिकार वाले स्टूडेंट्स के बीच की खाई और बढ़ सकती है, जिससे वे असल में “अमीर और गरीब” में बंट जाएंगे.
कोर्ट ने कहा, “कॉमर्स और ट्रेड की तरह, एजुकेशन तक भी फ्री एक्सेस होनी चाहिए. हमारे कहने पर इस पर बहुत कम रोक होगी. हम उन्हें और अमीर और गरीब में नहीं बांटने वाले हैं.”
कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि क्या इस दावे को सपोर्ट करने के लिए कोई भरोसेमंद मेडिकल रिसर्च है कि छोटे बच्चे बड़े स्टूडेंट्स की तुलना में प्रदूषित हवा के प्रति ज़्यादा सेंसिटिव होते हैं, और क्या प्रदूषण कंट्रोल उपायों के तहत स्कूली बच्चों के उम्र के आधार पर क्लासिफिकेशन पर फिर से सोचने की ज़रूरत है.
बच्चे प्रदूषण को लेकर ज्यादा सेंसेटिव ये मेडिकली प्रूव नहीं- Supreme Court
दिल्ली-NCR में एयर पॉल्यूशन को कंट्रोल करने वाले रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की जांच कर रहे एक सुओ मोटो केस में पेश हुए एक वकील से बेंच ने पूछा, “क्या आपने बच्चों के डॉक्टर की राय ली है? कोई भरोसेमंद रिसर्च?” बेंच ने बताया कि उसके सामने यह तय करने के लिए कोई मेडिकली स्थापित या पुष्ट राय नहीं थी कि छोटे बच्चों के फेफड़े प्रदूषित हवा से निपटने के लिए कम तैयार हैं या नहीं.
बेंच ने कहा, “हम फाइनल एक्सपर्ट हैं क्योंकि हम एक्सपर्ट्स को ज्यूडिशियल सपोर्ट देते हैं…हम एक्सपर्ट्स के हिसाब से चलेंगे,” और साफ किया कि वह कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की सिफारिशों पर भरोसा करेगा, जिसमें, उसने कहा, मेडिकल प्रोफेशनल्स समेत एक्सपर्ट्स की राय को ध्यान में रखा गया था.
बेंच ने आगे कहा कि उसे “कहानियों पर आधारित रिसर्च” में कोई दिलचस्पी नहीं है और वह सिर्फ अच्छी तरह से रिसर्च की गई, पीयर-रिव्यू की गई स्टडीज़ से ही मानेगी जो मौजूदा एक्सपर्ट फ्रेमवर्क से हटने को सही ठहरा सकें.
बेंच ने कहा, “GRAP चाहे जो भी कहे, या पीयर रिव्यू हों, भरोसेमंद रिसर्च पेपर हों, हम किसी भी तरह की राय पर नहीं चलेंगे.”
दिल्ली की एयर क्वालिटी में भारी गिरावट
ये बातें दिल्ली की एयर क्वालिटी में भारी गिरावट के बैकग्राउंड में आईं. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के डेटा के HT एनालिसिस से पता चलता है कि शहर शुक्रवार सुबह 6 बजे उन्हीं 39 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर ‘गंभीर’ कैटेगरी में चला गया, जो सरकार के पॉल्यूशन स्केल पर सबसे खराब ग्रेड है.
ऑफिशियल AQI, जो पिछले 24 घंटों की एवरेज रीडिंग है, सुबह 10 बजे 391 था. लेकिन जब हर घंटे की रीडिंग को ऐसे जांचा गया जैसे हर घंटे की एयर क्वालिटी पूरे दिन बनी रही हो, तो दिल्ली के सभी 59 मॉनिटरिंग स्टेशनों ने गुरुवार रात 8 बजे से हर घंटे ‘खराब’ एयर क्वालिटी रिकॉर्ड की. सुबह 10 बजे इसी तरह का हर घंटे का इंडेक्स 453 था. पिछली दिवाली पर जो 39 स्टेशन चालू थे, उन पर यह आंकड़ा 407 था, जिससे पता चलता है कि 20 नए स्टेशनों के जुड़ने से, जिनमें से कई ने तुलना में कम रीडिंग रिकॉर्ड की, कुल एवरेज नीचे आ रहा था.
बेंच ने कहा कि यह गिरावट खास तौर पर चिंता की बात है क्योंकि नवंबर से और अगले कई महीनों तक दिल्ली में AQI का लेवल 300 से ऊपर रहने की संभावना है. इसने कहा कि इस दौरान “खराब” और “बहुत खराब” एयर क्वालिटी लगभग नॉर्मल हो गई है, और सबसे बड़ी चुनौती स्थिति को ‘खराब’ और ‘खराब प्लस’ कैटेगरी में जाने से रोकना है.
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