Upendra Kushwaha RLM पटना: बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा जल्द ही अपनी पार्टी का भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय कर सकते हैं। बिहार में होने वाले संभावित कैबिनेट विस्तार से पहले इस चर्चा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
Upendra Kushwaha RLM पर कैबिनेट विस्तार से पहले विलय का दबाव?
सूत्रों की मानें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में नीतीश सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार होना है. चर्चा है कि इस विस्तार से पहले भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के सामने अपनी पार्टी के विलय का प्रस्ताव रखा है. हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी तक किसी भी पक्ष ने इसकी पुष्टि नहीं की है, लेकिन कुशवाहा की दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई हालिया मुलाकातों ने इन कयासों को हवा दे दी है.
राज्यसभा और 2025 का समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव में हार के बावजूद भाजपा ने कुशवाहा को राज्यसभा भेजा. मार्च 2026 में कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजकर भाजपा ने यह साफ कर दिया कि वह कुशवाहा को एनडीए के साथ बनाए रखना चाहती है लेकिन जानकारों का कहना है कि इस ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ के पीछे शर्त अपनी पार्टी के विलय की हो सकती है.
बेटे के राजनीतिक भविष्य की चिंता
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ा कारण उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का राजनीतिक भविष्य माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि कुशवाहा अपने बेटे को बिहार की राजनीति में स्थापित करने के लिए भाजपा से बातचीत कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि उनके बेटे को विधान परिषद (MLC) भेजा जाए या मंत्रिमंडल में जगह मिले. इसी रणनीति के तहत वे भाजपा के साथ विलय के विकल्प पर विचार कर सकते हैं.
RLM के भीतर बगावत के सुर
उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह फैसला आसान नहीं है. पार्टी के भीतर असंतोष चरम पर है. नवंबर 2025 में जब कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने की कोशिश की, तो पार्टी के विधायक और कार्यकर्ता नाराज हो गए क्योंकि दीपक प्रकाश सदन के सदस्य भी नहीं थे. विधायकों को डर है कि भाजपा में विलय के बाद उनका राजनीतिक वजूद खत्म हो जाएगा और भविष्य में उन्हें टिकट मिलेगा या नहीं, इस पर संशय है.
‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से सार्वजनिक हुई दरार
पार्टी के भीतर गुटबाजी तब सार्वजनिक हो गई जब कुशवाहा के आवास पर आयोजित ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से तीन प्रमुख विधायक— रामेश्वर कुमार महतो, आलोक सिंह और आनंद माधव गायब रहे. डैमेज कंट्रोल के लिए जनवरी 2026 में आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन स्थिति अब भी नाजुक बनी हुई है. चर्चा है कि ये विधायक सीधे भाजपा या जदयू के संपर्क में हैं.
क्या इतिहास दोहराएंगे कुशवाहा?
यह पहली बार नहीं है जब कुशवाहा विलय की राह पर हैं. इससे पहले वे अपनी पार्टी का जनता दल यूनाइटेड (JDU) में भी विलय कर चुके हैं लेकिन सम्मान की कमी का हवाला देकर उन्होंने 2023 में अलग राह चुनी और RLM का गठन किया. अब देखना यह होगा कि क्या कुशवाहा अपने बेटे के भविष्य और अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए अपनी क्षेत्रीय पहचान को भाजपा के नाम कर देंगे या उनकी पार्टी में टूट की स्थिति पैदा होगी.

