BRICS SUMMIT 2026: मोदी-पेजेशकियान की बैठक खत्म,पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत-ईरान रिश्तों पर दुनिया की नजर

Modi and Pezeshkian Meeting नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच शुक्रवार को महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई. दोनों नेताओं के बीच यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम एशिया गंभीर भू-राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है और ईरान से जुड़ा संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है.

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान BRICS Summit 2026 में हिस्सा लेने के लिए शुक्रवार को नई दिल्ली पहुंचे. उनके भारत दौरे को खास महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि यह राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी पहली भारत यात्रा है. इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी और पेजेशकियान की अगस्त के अंत में बिश्केक में SCO Summit के दौरान भी द्विपक्षीय बातचीत हुई थी. उस बैठक में दोनों नेताओं ने भारत-ईरान संबंधों, पश्चिम एशिया की स्थिति और क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की थी.

Modi and Pezeshkian Meeting:पश्चिम एशिया संकट के बीच हुई अहम मुलाकात

मोदी और पेजेशकियान की बैठक का सबसे बड़ा संदर्भ पश्चिम एशिया में जारी संकट है.भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए.

भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है. इस क्षेत्र से भारत के ऊर्जा हित, समुद्री व्यापार, भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा तथा व्यापक आर्थिक हित जुड़े हुए हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल की अपनी बातचीत में भी संघर्षों को संवाद और कूटनीति के जरिए हल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है. ईरान के साथ बातचीत में भी क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का मुद्दा महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

भारत के लिए ईरान क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत और ईरान के संबंध कई दशक पुराने हैं. दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं.

सबसे अहम परियोजनाओं में चाबहार बंदरगाह शामिल है. यह भारत को ईरान के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की रणनीति से जुड़ा है. ऐसे समय में जब क्षेत्रीय भू-राजनीति तेजी से बदल रही है, भारत के लिए ईरान के साथ संपर्क और संवाद बनाए रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.

भारत ईरान के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाते हुए दूसरी तरफ अमेरिका, इजरायल, रूस और खाड़ी देशों के साथ भी अपने रिश्तों को संतुलित कर रहा है. यही वजह है कि मोदी-पेजेशकियान बैठक को भारत की बहु-आयामी विदेश नीति के नजरिए से भी देखा जा रहा है.

BRICS के मंच पर ईरान की भूमिका भी महत्वपूर्ण

ईरान अब BRICS का पूर्ण सदस्य है. जनवरी 2024 में ईरान समेत मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब और UAE जैसे देशों के जुड़ने के बाद संगठन का दायरा काफी बढ़ा है. 2026 में भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वां शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है.

इस समय BRICS में कुल 11 पूर्ण सदस्य हैं. इनमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के अलावा ईरान, सऊदी अरब, UAE, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया शामिल हैं.

ईरान की मौजूदगी BRICS के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि संगठन के सामने अब केवल आर्थिक सहयोग का मुद्दा नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, भुगतान व्यवस्था और पश्चिम एशिया के संघर्ष जैसे विषय भी प्रमुख हो गए हैं.

डॉलर पर निर्भरता घटाने का मुद्दा भी चर्चा में

भारत पहुंचने से पहले ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने BRICS के आर्थिक सहयोग और डॉलर पर निर्भरता कम करने से जुड़े मुद्दों पर जोर दिया था. उन्होंने BRICS बैंक और सदस्य देशों के बीच आर्थिक एवं व्यापारिक सहयोग को मजबूत करने की जरूरत की बात कही थी.

हालांकि, भारत की स्थिति इस मुद्दे पर व्यावहारिक रही है. नई दिल्ली BRICS के भीतर आर्थिक सहयोग और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार जैसे विकल्पों पर चर्चा का समर्थन करती है, लेकिन भारत अपनी वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को किसी एक धड़े तक सीमित करने की नीति नहीं अपनाता.

यही संतुलन इस BRICS Summit में भारत की भूमिका को खास बनाता है.

मोदी-पुतिन मुलाकात के बाद पेजेशकियान से वार्ता

मोदी-पेजेशकियान मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी द्विपक्षीय बातचीत की. दोनों नेताओं ने भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के साथ ऊर्जा, रक्षा और क्षेत्रीय एवं वैश्विक घटनाक्रम पर चर्चा की. दोनों पक्षों ने भारत-रूस विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई.

मोदी-पुतिन वार्ता में पश्चिम एशिया और ब्लैक सी क्षेत्र के संघर्षों से समुद्री व्यापार तथा भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा भी उठा. भारत ने संघर्षों को बातचीत और कूटनीति से हल करने की अपनी स्थिति दोहराई.

इसके बाद ईरानी राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री की मुलाकात ने भारत की कूटनीतिक सक्रियता को और महत्वपूर्ण बना दिया.

BRICS Summit में चीन की मौजूदगी भी अहम

BRICS Summit 2026 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है. शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं. ऐसे में मोदी और शी के बीच संभावित द्विपक्षीय बातचीत पर भी दुनिया की नजर है.

BRICS के दौरान भारत को एक साथ रूस, चीन, ईरान और अन्य प्रमुख देशों के साथ बातचीत करनी है. इसके साथ ही भारत के अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक संबंध हैं.

ऐसे में दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन भारत के लिए केवल BRICS की अध्यक्षता निभाने का अवसर नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र और संतुलित कूटनीतिक भूमिका दिखाने का बड़ा मंच भी है.

पश्चिम एशिया संकट से BRICS की एकता की परीक्षा

BRICS के विस्तार ने संगठन का प्रभाव बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं. ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे ऐसे देश अब एक ही मंच पर हैं, जिनके पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्षों को लेकर हित और प्राथमिकताएं पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया का संकट इस विस्तारित BRICS की एकजुटता की परीक्षा ले सकता है. मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में भी साझा बयान पर सहमति न बन पाने का संदर्भ सामने आया था.

इसलिए भारत के सामने चुनौती यह है कि वह BRICS को किसी सैन्य या राजनीतिक धड़े के रूप में पेश किए बिना आर्थिक सहयोग, विकास, ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर केंद्रित रखे.

भारत की कूटनीति के लिए क्यों खास है यह बैठक?

मोदी-पेजेशकियान बैठक का महत्व तीन स्तरों पर समझा जा सकता है.

पहला, क्षेत्रीय स्तर पर, भारत ईरान के साथ संवाद बनाए रखकर पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की अपनी भूमिका को मजबूत कर सकता है.

दूसरा, आर्थिक स्तर पर, भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण हैं. पश्चिम एशिया में किसी भी लंबे संकट का असर तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है.

तीसरा, वैश्विक स्तर पर, BRICS के विस्तार के बाद भारत को रूस, चीन, ईरान और खाड़ी देशों के साथ एक ही मंच पर काम करना है, जबकि पश्चिमी देशों के साथ उसके रणनीतिक संबंध भी लगातार मजबूत हैं.

यानी दिल्ली में हो रही यह बातचीत भारत की उस विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें नई दिल्ली अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है.

BRICS Summit पर टिकी दुनिया की नजर

18वां BRICS Summit 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जा रहा है. भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता का विषय “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” है. सम्मेलन में 11 सदस्य देशों के नेता और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख हिस्सा ले रहे हैं।

इस सम्मेलन के एजेंडे में आर्थिक सहयोग, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, तकनीक, स्वास्थ्य, सप्लाई चेन और वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों जैसे मुद्दे प्रमुख हैं.

ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान की द्विपक्षीय बैठक को भारत-ईरान संबंधों के साथ-साथ पूरे पश्चिम एशिया की स्थिति के संदर्भ में देखा जा रहा है.

बैठक के विस्तृत आधिकारिक ब्योरे का इंतजार है. उसके सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि दोनों नेताओं ने किन-किन मुद्दों पर ठोस सहमति या आगे की रणनीति तय की.

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