Tuesday, March 3, 2026

साड़ियों के लिए दीवानगी ऐसी की सुबह 4 बजे से महिलाएं लगाती है लाइन..साड़ियों की कीमत सुनकर रह जायेंगे हैरान

Mysore silk saree : भारत में आमतौर से महिलाओं के लिए कहा जाता है कि अगर उन्हें मौके मिले तो वो अच्छी साडियों और गहनों लिए कुछ भी कर सकती हैं. इसका बात का जीता जागता उदाहरण आप  मैसूर में देख सकते हैं ,  जहां महिलाएं प्योर सिल्क साड़ियों के लिए कर्नाटक सोवियत (सॉरी सिल्क)  इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन के शोरूम के बाहर सुबह 4.00 बजे से लाइन में लगाती दिख जाती हैं. यहां मिलने वाली एक एक सिल्क की साड़ी की कीमत  23,000 से लेकर 250,000 रुपये तक है.

Mysore silk saree : घंटों लाइन में रहने के बाद भी मिलती है केवल एक साड़ी 

अभी तो आप केवल साड़ियों की कीमत जानकर हैरान हो रहे होंगे लेकिन आपको ये जानकर और अधिक हैरानी होगी कि अगर आपके पास यहां एक से अधिक साडियां खरीदने के लिए पैसे हों, तब भी कोई फायदा नहीं है क्योंकि यहां हर व्यक्ति को केवल एक ही साड़ी खरीदने की इजाजत है. हर व्यक्ति को यहां लाइन में लगने के लिए पहले एक टोकन लेना पड़ता है फिर उन्हें साड़ी दी जाती है.हर ग्राहक को केवल 1 ही साड़ी मिलती है.

दरअसल कर्नाटक समेत पूरे दक्षिण भारत में सिल्क साडियों की मांग सालो भर रहती है लेकिन शादी ब्याह और त्योहारों के समय इसकी मांग अधिक हो जाती है. सीज़नल पीक (शादियां, वरलक्ष्मी पूजा, गौरी गणेश, दीपावली) पर तो इसकी डिमांड आसमानों पर रहती है लेकिन यहां इन इन दिनों ग्राहक अधिक है और साडियां कम.  खास मौके इस कमी को और बढ़ा देते हैं, जिससे शोरूम में सामान जल्दी बिक जाता है. पिछले कई सालों से यहां शुद्ध भारतीय रेशम के साडियों की कमी रही है. कर्नाटक में शुद्ध शिल्क की साडियां कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन बनाती है, जिनके पास प्योर मैसूर सिल्क साड़ियों के लिए ऑफिशियल प्रोडक्शन और GI-टैग वाले अधिकार हैं.

जानकारों के मुताबिक कर्नाटक में साल दर साल इसे खरीदने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन पिछले साल भी यहां साड़ियों की किल्लत रही और इस साल यानी 2026 में भी इसके समाधान का कोई साफ संकेत दिखाई नहीं दे रहा है.

मैसूर सिल्क साड़ियों की किल्लत क्यों ? 

साडियों की किल्लत को लेकर कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन का कहना है कि उनके पास कारीगरों के कमी है, स्किल्ड बुनकरों और कारीगरों की संख्या बेहद कम है और जो नये आते हैं उन्हें न्यूनतम महारत हासिल करने में भी 6-7 महीने लग जाते हैं. इसके आलावा प्रोडक्शन कॉर्पोरेशन के ट्रेंड वर्कफोर्स और सुविधाओं तक ही सीमित है, जिससे तेज़ी से प्रोडक्शन बढ़ाना मुश्किल है.

सौ वर्षों से भी अधिक पुरानी है ये इंडस्ट्री   

कर्नाटक में 1912 में मैसूर महाराजा नलवाडि श्री कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ (Nalwadi Krishnaraja Wadiyar IV)  ने सिल्क बुनने की फैक्ट्री की शुरू करवाई थी, जो 1980 में Karnataka Silk Industries Corporation (KSIC) बन गई. इस कॉर्पोरेशन की खासियत ये है कि यहां असली सिल्क की प्रमाणिकता पक्की है. इन साडियों को उनकी प्रमाणिकता के लिए GI टैग मिला हुआ है. लोगो के बीच यहां से सिल्क खरीदने की होड़ इस लिए भी है क्योंकि इन दिनों  प्राइवेट सेक्टर की कंपनियाँ नकली या चीन में बने आर्टिफिशियल सिल्क से बने साडियों और अन्य कपड़ों से ग्राहकों को धोखा देते हैं. इसका ताजा उदाहरण तिरुपति में देखने के लिए मिला जहां प्राइवेट ठेकेदार भक्तों को नकली सिल्क सप्लाई कर रहा था.

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