CM Samrat Chaudhary : भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को पारंपरिक रूप से एक ‘काडर बेस’ और विचारधारा प्रधान पार्टी माना जाता रहा है. एक दौर था जब यह कहा जाता था कि संघ (RSS) की शाखाओं से तपकर निकले नेता ही पार्टी के शीर्ष पदों तक पहुँच सकते हैं लेकिन पिछले एक दशक में बीजेपी ने इस धारणा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है. आज पार्टी के लिए ‘विनिंग कैपेसिटी’ यानी चुनाव जीतने की क्षमता सबसे बड़ा पैमाना बन गई है. ताजा उदाहरण बिहार काॉ है,जहाँ सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक नई इबारत लिख दी है.
CM Samrat Chaudhary:RJD की नर्सरी से BJP के शीर्ष तक
बिहार की सियासत में बुधवार का दिन ऐतिहासिक रहा जब राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. उन्होंने 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव की आरजेडी से अपने करियर की शुरुआत की थी और राबड़ी देवी सरकार में मंत्री भी रहे. इसके बाद वे जेडीयू में गए और महज 8 साल पहले 2017 में बीजेपी का दामन थामा. बिना किसी संघ पृष्ठभूमि के बीजेपी ने उन्हें बिहार में अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाकर सबको चौंका दिया है.
पूर्वोत्तर में कांग्रेस के ‘हाथ’ से निकला थामा बीजेपी का ‘कमल’
बीजेपी की इस रणनीति का सबसे सफल उदाहरण असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं. हिमंत कभी असम कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व सीएम तरुण गोगोई के सबसे खास सिपहसालार थे. 2015 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया और आज वे पूरे पूर्वोत्तर भारत में पार्टी के सबसे बड़े संकटमोचक बन चुके हैं. कुछ ऐसा ही हाल अरुणाचल प्रदेश के सीएम पेमा खांडू और त्रिपुरा के सीएम माणिक साहा का भी है. ये दोनों नेता मूल रूप से कांग्रेसी थे, लेकिन आज बीजेपी के झंडे तले अपनी सत्ता को और मजबूत कर चुके हैं.
दक्षिण से उत्तर तक ‘बाहरी’ टैलेंट की बल्ले-बल्ले
बीजेपी ने दक्षिण भारत के अपने एकमात्र गढ़ कर्नाटक में भी यही प्रयोग दोहराया था. पार्टी ने दिग्गज नेता येदियुरप्पा की जगह 2021 में बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी. बोम्मई का राजनीतिक डीएनए ‘जनता दल’ का था और वे अपने पिता एस.आर. बोम्मई की विरासत लेकर 2008 में बीजेपी में आए थे.
उत्तर प्रदेश में भी फार्मूला लागू
उत्तर प्रदेश में भी यही कहानी दिखती है, जहाँ बृजेश पाठक ने कांग्रेस और बसपा के रास्ते बीजेपी में प्रवेश किया और आज वे राज्य के उपमुख्यमंत्री के रूप में पार्टी का सबसे बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं.
पुराने कार्यकर्ताओं का दर्द और पार्टी की मजबूरी
हालांकि, बाहरी नेताओं को मिल रही इस तवज्जो ने पार्टी के भीतर पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच एक टीस भी पैदा की है. जब विजय सिन्हा बिहार में सम्राट चौधरी का नाम प्रस्तावित कर रहे थे, तब उनके शब्दों में वह दर्द साफ झलका. उन्होंने कहा था कि “हमने शुरू से पार्टी के लिए खून-पसीना बहाया है.” यह बयान उन हजारों कार्यकर्ताओं की भावना को दर्शाता है जो दशकों से विचारधारा के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन शीर्ष पदों पर ‘लेटरल एंट्री’ वाले नेताओं का कब्जा होता जा रहा है.
बीजेपी का नया सियासी संदेश: ‘जीत ही सर्वोपरि’
सम्राट चौधरी से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा और अर्जुन मुंडा तक की यह लंबी सूची एक स्पष्ट संदेश देती है. बीजेपी अब एक ऐसी चुनावी मशीन बन चुकी है जिसे सिर्फ परिणाम चाहिए. पार्टी का स्पष्ट मानना है कि अगर आपमें सियासी दमखम है और आप चुनाव जिताने का हुनर रखते हैं, तो आपकी राजनीतिक जड़ें कहाँ थीं, यह मायने नहीं रखता. बीजेपी के लिए अब विचारधारा और संगठन के साथ-साथ ‘जीतने की क्षमता’ सफलता का नया मंत्र बन गई है.

