Modi Cabinet Expansion नई दिल्ली:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं. इस बार का कैबिनेट विस्तार पहले के मुकाबले अलग माना जा रहा है, क्योंकि अब NDA में कई नए सहयोगी और हाल ही में समर्थन देने वाले सांसद भी शामिल हो चुके हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंत्री पदों में प्राथमिकता पुराने सहयोगी दलों को मिलेगी या फिर हाल में NDA के साथ आए नए सांसदों को.
पिछले दो कार्यकाल में जब मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया था, तब बीजेपी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत में थी. सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व जरूर मिला, लेकिन सरकार की मजबूरी नहीं थी . इस बार परिस्थितियां अलग हैं और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है.
Modi Cabinet Expansion:नए सहयोगियों की दावेदारी ने बढ़ाया सियासी गणित
हाल के दिनों में विभिन्न दलों से कई सांसद NDA के साथ आए हैं. इनमें आम आदमी पार्टी (AAP) से अलग हुए 7 सांसद, तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत करने वाले 20 सांसद और शिवसेना (UBT) छोड़ने वाले 6 सांसद शामिल बताए जा रहे हैं. ऐसे में यह चर्चा तेज है कि क्या इन नए सहयोगियों को मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी.
हालांकि, मंत्रिमंडल का गठन और विस्तार प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है लेकिन राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है.
TMC के 20 बागी सांसदों पर टिकी नजर
सबसे ज्यादा चर्चा तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों को लेकर है. इन सांसदों ने स्पीकर से मिलकर दावा किया है कि वे नई पार्टी NCPI में शामिल हो चुके हैं और देश के विकास के लिए NDA सरकार को समर्थन दे रहे हैं.
इन सांसदों में काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय, शताब्दी रॉय, माला रॉय, यूसुफ पठान और अरुप चक्रवर्ती जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं. हालांकि अभी इनकी संवैधानिक स्थिति पर लोकसभा स्पीकर का अंतिम फैसला आना बाकी है. ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से किसे मंत्री पद की जिम्मेदारी मिल सकती है.
AAP से आए सांसदों में भी नेतृत्व का सवाल
आम आदमी पार्टी से अलग होकर NDA का समर्थन करने वाले सांसदों को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है. चर्चा राघव चड्ढा समेत सात सांसदों को लेकर है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व को लेकर खड़ा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी समूह का स्पष्ट नेता नहीं होगा, तो मंत्री पद के लिए नाम तय करना आसान नहीं होगा. ऐसे में AAP छोड़कर आए सांसदों में किसे मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी, इस पर अभी सस्पेंस बना हुआ है.
शिंदे गुट का बढ़ेगा मंत्री कोटा?
शिवसेना (UBT) से अलग हुए सांसदों के NDA में आने के बाद एकनाथ शिंदे गुट की ताकत और बढ़ गई है. अब शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 13 बताई जा रही है, जो कई सहयोगी दलों से अधिक है.
फिलहाल केंद्र सरकार में शिवसेना को एक मंत्री पद मिला हुआ है, जबकि जेडीयू के पास दो और टीडीपी के पास भी दो मंत्री हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या शिंदे गुट का मंत्री कोटा बढ़ाया जाएगा और अगर बढ़ेगा तो मौका पुराने सांसदों को मिलेगा या नए शामिल हुए नेताओं को.
जेडीयू और टीडीपी भी बढ़ा सकते हैं दबाव
मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच जेडीयू और टीडीपी भी अपने प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए बैठे हैं. वहीं, अजित पवार की पार्टी से भी किसी नए चेहरे को मंत्री बनाए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि पुराने सहयोगी दलों की नाराजगी भी न बढ़े और हाल ही में NDA में शामिल हुए नए समर्थकों को भी उचित राजनीतिक संदेश दिया जा सके.
कैबिनेट विस्तार में सबसे बड़ा सवाल
संभावित मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा सवाल यही है कि मोदी सरकार अनुभव और पुराने सहयोगियों को प्राथमिकता देगी या फिर नई राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए हाल में NDA का साथ देने वाले सांसदों को मंत्री पद देकर बड़ा संदेश देगी. इस फैसले पर आने वाले दिनों में पूरे राजनीतिक जगत की नजर बनी रहेगी.





