कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल का ‘अड़ंगा’,लिपुलेख विवाद पर भारत-चीन को भेजा कूटनीतिक पत्र

Kailash Mansarovar Yatraकाठमांडू/नई दिल्ली: इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा के शुरू होने से पहले नेपाल ने एक नया विवाद  शुरु किया है जो भारत -नेपाल मैत्री संबंधों का शबब बन गया है. नेपाल की बालेन सरकार ने लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से तीर्थयात्रा संचालित करने की योजना पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत और चीन दोनों देशों को ‘डिप्लोमैटिक प्रोटेस्ट नोट’ (कूटनीतिक विरोध पत्र) भेजा है. नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र उसकी संप्रभुता के अंतर्गत आता है, इसलिए इस क्षेत्र में हर गतिविधि पर उनका अधिकार है.

Kailash Mansarovar Yatra :नेपाल की भारत को  दो टूक

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकबहादुर पौडेल क्षेत्री ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख के रास्ते यात्रा चलाने की किसी भी योजना पर उन्हें सख्त आपत्ति है. नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार, यह विरोध किसी एक व्यक्ति या नेता का नहीं है, बल्कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों ने एकमत होकर यह ‘प्रोटेस्ट नोट’ भेजने का फैसला किया है.

विवाद की जड़: 1816 की सुगौली संधि

नेपाल और भारत के बीच इस तनातनी की जड़ें 200 साल पुरानी ‘सुगौली संधि’ (1816) में हैं. नेपाल सरकार का दावा है कि इस संधि के तहत महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का पूरा इलाका नेपाल का हिस्सा है. नेपाल ने हाल के वर्षों में अपने आधिकारिक नक्शे में भी इन क्षेत्रों को शामिल किया है, जिसका भारत हमेशा खंडन करता रहा है.

भारत और चीन दोनों को घेरा

बालेन सरकार का यह कदम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन को भी कूटनीतिक पत्र भेजा है. नेपाल ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में साफ कहा है कि इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, व्यापार या तीर्थयात्रा जैसी कोई भी गतिविधि उसकी अनुमति के बिना नहीं होनी चाहिए. नेपाल का मानना है कि दिल्ली और बीजिंग दोनों को इस संवेदनशील मुद्दे का सम्मान करना चाहिए.

विशेषज्ञों की राय: क्या कहते हैं जानकार?

 1. कूटनीतिक दबाव की रणनीति :विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में घरेलू राजनीति के कारण ‘राष्ट्रवाद’ का कार्ड खेला जा रहा है. बालेन सरकार इस मुद्दे को उठाकर जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है. भारत और चीन दोनों को पत्र भेजकर नेपाल खुद को एक स्वतंत्र और सख्त फैसले लेने वाले राष्ट्र के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है.

2. भारत का रुख और सुरक्षा चिंताएं :रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए लिपुलेख सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारत इसे हमेशा से अपना हिस्सा मानता रहा है और कैलाश मानसरोवर के लिए यहाँ सड़क निर्माण का कार्य भी तेजी से किया गया है. भारत इस ‘प्रोटेस्ट नोट’ को सिरे से खारिज कर सकता है, क्योंकि भारत के अनुसार सुगौली संधि की व्याख्या नेपाल अपनी सुविधा अनुसार कर रहा है.

3. त्रिपक्षीय उलझन :विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन को इस विवाद में घसीटना मामले को और पेचीदा बना सकता है. अगर चीन नेपाल के दावे का समर्थन करता है, तो भारत के लिए यह सुरक्षा चुनौती बन सकता है। हालांकि, चीन आमतौर पर ऐसे मामलों में ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपनाता है.

आगे क्या होगा?

फिलहाल, नेपाल के इस कड़े रुख ने दिल्ली और बीजिंग के गलियारों में हलचल तेज कर दी है. अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि भारत सरकार इस विरोध पत्र का जवाब किस कूटनीतिक भाषा में देती है. क्या इस विवाद का असर आगामी तीर्थयात्रा पर पड़ेगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा.

 भारत सरकार ने जारी किया कैलाश मानसरोबर यात्रा का शिड्यूल 

इस बीच भारत की तरफ से विदेश मंत्रालय ने इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम जारी कर दिया है. यह तीर्थयात्रा 30 जून को शुरू होगी. पहला जत्था 4 जुलाई को दिल्ली से रवाना होगा और 5 जुलाई को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में धारचूला पहुँचेगा. इसके बाद, यह समूह 6 जुलाई को गुंजी जाएगा, जहाँ भारत-तिब्बत सीमा पुलिस द्वारा उनका मेडिकल परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद 10 जुलाई को वे लिपुलेख दर्रे से होते हुए चीन में प्रवेश करेंगे.

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