Jharkhand Mandar GI Tag रांची: झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और आदिवासी परंपराओं की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication GI) का दर्जा मिल गया है. तमिलनाडु के चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने मांदर को GI टैग प्रदान किया है. इस मान्यता से झारखंड के पारंपरिक संगीत, लोकनृत्य और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े इस वाद्य यंत्र को एक नई पहचान मिली है.
मांदर लंबे समय से झारखंड के लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है.राज्य की विभिन्न लोक परंपराओं,सामुदायिक आयोजनों और पारंपरिक नृत्य-संगीत में इसका विशेष महत्व है. GI टैग के लिए दायर आवेदन में मांदर की बनावट, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक, ध्वनि की विशेषताओं और झारखंड की संस्कृति से इसके गहरे संबंधों का विवरण प्रस्तुत किया गया था.
इस GI मान्यता को हासिल करने की प्रक्रिया में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची के विजिटिंग फैकल्टी और बौद्धिक संपदा अधिकार एवं भौगोलिक संकेतक विशेषज्ञ डॉ. सत्यदीप सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
Jharkhand Mandar GI Tag:2021 में दाखिल किया गया था GI टैग का आवेदन
झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर को GI टैग दिलाने के लिए वर्ष 2021 में आवेदन दाखिल किया गया था. इसके बाद आवेदन से जुड़ी प्रक्रियाओं, ऐतिहासिक दस्तावेजों और मांदर की विशिष्ट पहचान को प्रमाणित करने वाले साक्ष्यों को प्रस्तुत करने का काम किया गया.
डॉ. सत्यदीप सिंह ने आवेदन दाखिल करने से लेकर चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री के समक्ष पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज जमा करने तक की प्रक्रिया की निगरानी की. उन्होंने आवेदन से जुड़ी औपचारिकताओं को पूरा करने के साथ अंतिम सुनवाई में भी मामले का प्रतिनिधित्व किया.
जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई के दौरान डॉ. सिंह ने मांदर को GI मान्यता दिए जाने के पक्ष में दलीलें पेश कीं. आवेदन के समर्थन में ऐतिहासिक संदर्भों और दस्तावेजों को भी आधार बनाया गया.
ऐतिहासिक दस्तावेजों से साबित हुआ झारखंड से मांदर का संबंध
मांदर को GI टैग दिलाने के लिए प्रस्तुत आवेदन में कई पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुस्तकों का उल्लेख किया गया. इन संदर्भों का उद्देश्य यह स्थापित करना था कि मांदर का झारखंड की लोक परंपराओं और यहां के समुदायों के जीवन से लंबे समय से संबंध रहा है.
इनमें मानवविज्ञानी शरत चंद्र रॉय की वर्ष 1915 की कृति, तारक चंद्र दास की वर्ष 1931 की रचना और डब्ल्यू.जी. आर्चर की वर्ष 1940 में प्रकाशित पुस्तक The Blue Grove शामिल हैं.
इसके अलावा पटना संग्रहालय की वर्ष 1920 की वार्षिक रिपोर्ट, भारत सरकार की वर्ष 1956 में प्रकाशित पुस्तक Folk Dances of India और बिहार जिला गजेटियर (रांची) के संदर्भ भी आवेदन में शामिल किए गए.
इन दस्तावेजों में मांदर को झारखंड के आदिवासी समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र बताया गया है। ऐतिहासिक स्रोतों ने इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता और क्षेत्र के साथ इसके पुराने संबंधों को सामने रखने में मदद की.
छोटानागपुर में मांदर की परंपरा का मिला उल्लेख
मांदर को GI टैग दिलाने के लिए प्रस्तुत ऐतिहासिक साक्ष्यों में डब्ल्यू.जी. आर्चर के अध्ययन का विशेष महत्व रहा. आर्चर ने छोटानागपुर क्षेत्र में रहते हुए उरांव समुदाय की परंपराओं और लोकजीवन का अध्ययन किया था.
उनकी पुस्तक The Blue Grove में मांदर का उल्लेख स्थानीय पारंपरिक नृत्य और संगीत से जुड़े वाद्य यंत्र के रूप में मिलता है. आर्चर द्वारा संकलित स्थानीय लोककथाएं और सांस्कृतिक विवरण भी इस बात को रेखांकित करते हैं कि मांदर का समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरा स्थान रहा है.

