GDP पर सवालों के बीच नीलकंठ मिश्रा का पलटवार, बोले- 7.5% तक जा सकती है भारत की अर्थव्यवस्था

India’s GDP growth नई दिल्ली: भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी दर्ज किए जाने के बाद जहां सरकार इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत बता रही है, वहीं पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस ने इन आंकड़ों की विश्वसनीयता तथा गणना के तरीके पर सवाल उठाए हैं.

सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि पिछले साल (Q1 FY2025-26) की करेंट प्राइस (नॉमिनल) GDP पहले लगभग ₹86 लाख करोड़ बताई गई थी, जिसे बाद में संशोधित करके लगभग ₹80 लाख करोड़ कर दिया गया यानी मूल राशि में करीब ₹6 लाख करोड़ की कटौती की गई. 

अगर पुराने (असंशोधित) ₹86 लाख करोड़ वाले आंकड़े से तुलना की जाए, तो इस साल की नॉमिनल GDP ग्रोथ सिर्फ लगभग 2.6% (कुछ रिपोर्टों में 2.5% से कम) बैठती है. 

सुभाष गर्ग के इसी तर्क के जवाब में अब विश्वबैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा अपना तर्क लेकर आये हैं.  मिश्रा ने  GDP के आंकड़ों का बचाव करते हुए आलोचकों पर तीखा पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि नई GDP सीरीज को समझे बिना पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करना उचित नहीं है. मिश्रा ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के समर्थन में वाहन बिक्री, बैंक कर्ज, टैक्स कलेक्शन, निर्यात और निवेश से जुड़े कई आंकड़े भी सामने रखे हैं.

India’s GDP growth:नई GDP सीरीज बनी विवाद की वजह

GDP को लेकर मौजूदा विवाद की मुख्य वजह फरवरी 2026 में जारी की गई GDP की नई सीरीज है. इसमें GDP की गणना का बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया. इसके साथ आंकड़े जुटाने और आर्थिक गतिविधियों को मापने के तरीकों में भी बदलाव किया गया.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने नई सीरीज के बाद पिछली तिमाहियों के आंकड़ों में हुए बदलाव पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने जून 2025 की तिमाही के मौजूदा कीमतों वाले GDP आंकड़े में करीब 6 लाख करोड़ रुपये की कमी का मुद्दा उठाया.

गर्ग का दावा है कि यदि पुराने आंकड़ों को आधार बनाकर तुलना की जाए तो जून 2026 की GDP ग्रोथ करीब 2.6 फीसदी के आसपास दिखाई दे सकती है. यह आंकड़ा सरकार की ओर से बताए गए 7.8 फीसदी विकास दर से काफी अलग है.

कांग्रेस ने भी सरकार को घेरा

GDP के आंकड़ों को लेकर कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. पार्टी का कहना है कि केवल GDP ग्रोथ बढ़ने को आर्थिक मजबूती का पैमाना नहीं माना जा सकता.

कांग्रेस ने रोजगार, लोगों की आय, खपत और आम परिवारों की बचत जैसे मुद्दों को भी अर्थव्यवस्था के वास्तविक स्वास्थ्य से जोड़कर देखने की बात कही है. पार्टी का आरोप है कि नई GDP सीरीज के जरिए अर्थव्यवस्था की तस्वीर को वास्तविक स्थिति से ज्यादा मजबूत दिखाया जा रहा है.

नीलकंठ मिश्रा ने आलोचकों पर साधा निशाना

विवाद के बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर GDP आंकड़ों का बचाव किया. उन्होंने GDP सीरीज में बदलाव पर सवाल उठाने वालों के दावों को ‘अल्पज्ञान’ और ‘सरासर गलत’ बताया.

मिश्रा ने किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल का सीधे नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी को सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.

उनका कहना है कि नई GDP सीरीज में अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को मापने के लिए बेहतर तरीके अपनाए गए हैं. ऐसे में नई सीरीज के आंकड़ों की सीधे पुरानी सीरीज से तुलना करना सही निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाता.

वाहन बिक्री और निर्यात से मिल रहे मजबूती के संकेत

नीलकंठ मिश्रा ने GDP के अलावा अर्थव्यवस्था के दूसरे संकेतकों का भी हवाला दिया. उन्होंने अगस्त के आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि कार और SUV की बिक्री में करीब 35 फीसदी की वृद्धि हुई है.

इसी तरह दोपहिया वाहनों की बिक्री में 20 फीसदी से ज्यादा की तेजी और कमर्शियल वाहनों की बिक्री में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी का दावा किया गया है. निर्यात में भी करीब 9 फीसदी की वृद्धि का उल्लेख किया गया.

मिश्रा के मुताबिक, ये आंकड़े उपभोक्ता मांग, कारोबार और निर्माण गतिविधियों में मजबूती की ओर संकेत करते हैं.

बैंक लोन और टैक्स कलेक्शन भी बेहतर

मिश्रा ने बैंक लेंडिंग की स्थिति को भी अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक बताया. उनके अनुसार, पहले कर्ज की धीमी वृद्धि के पीछे बैंकों की कर्ज देने की क्षमता और रुख में कमजोरी एक वजह थी, लेकिन अब इसमें सुधार दिखाई दे रहा है.

टैक्स कलेक्शन और निर्माण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों को भी उन्होंने मजबूत बताया. उनका तर्क है कि अगर निजी निवेश कमजोर होता तो निर्माण और उससे जुड़े आर्थिक संकेतकों में इस तरह की मजबूती देखने को नहीं मिलती.

उन्होंने निजी क्षेत्र के निवेश को लेकर लगातार निराशावादी दावों पर भी सवाल उठाया और कहा कि निवेश गतिविधियां जारी रहने के स्पष्ट संकेत मौजूद हैं.

आम आदमी की कमाई अभी भी चुनौती

हालांकि नीलकंठ मिश्रा ने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ कमजोरियां अभी मौजूद हैं. खासतौर पर वास्तविक वेतन यानी महंगाई को समायोजित करने के बाद होने वाली आय की धीमी वृद्धि एक चुनौती है.

उनके अनुसार, इस स्थिति में पूरी तरह सुधार आने में कुछ तिमाहियां लग सकती हैं. लेबर मार्केट को मजबूत करने और अर्थव्यवस्था की बची हुई कमजोरियों को दूर करने के लिए लगातार कई तिमाहियों तक औसत से ज्यादा आर्थिक विकास दर बनाए रखना जरूरी होगा.

7.5 फीसदी तक पहुंच सकती है GDP ग्रोथ

भविष्य की आर्थिक तस्वीर को लेकर मिश्रा का रुख सकारात्मक है. उनका मानना है कि भारत पर बजट से जुड़ा दबाव कम हो रहा है और मौद्रिक नीतियां भी आर्थिक गतिविधियों के लिए अनुकूल बन रही हैं.

उनके मुताबिक आने वाले समय में भारत की औसत GDP ग्रोथ 7 फीसदी से ऊपर रह सकती है. यहां तक कि अगर राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां सामान्य या तटस्थ रहती हैं, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 7.5 फीसदी की विकास दर हासिल कर सकती है. हालांकि, उन्होंने भविष्य में महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना को लेकर भी सावधान किया है.

कुल मिलाकर देखा जाये तो भारत की GDP ग्रोथ को लेकर फिलहाल दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं. एक तरफ नई GDP सीरीज और इसके आधार पर जारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वाहन बिक्री, निर्यात, बैंक कर्ज, टैक्स कलेक्शन और निर्माण गतिविधियों जैसे संकेतकों के आधार पर अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा किया जा रहा है. ऐसे में आने वाली तिमाहियों के आंकड़े यह तय करने में अहम होंगे कि भारत की आर्थिक रफ्तार कितनी टिकाऊ साबित होती है.

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