पवन खेड़ा की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस- क्या ‘असम सीएम’ हैं संवैधानिक काउबॉय ?

Panav Khera Bail Petition नई दिल्ली: कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में हाई-प्रोफाइल ड्रामा और जोरदार कानूनी बहस देखने को मिली। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी द्वारा दर्ज मानहानि मामले में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और सरकार के वकील एक-दूसरे के आमने-सामने नजर आए।

Panav Khera Bail Petition-“संवैधानिक काउबॉय” की तरह व्यवहार कर रहे CM-सिंघवी

पवन खेड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश करते हुए असम के मुख्यमंत्री पर सीधा हमला बोला. सिंघवी ने मुख्यमंत्री को ‘संवैधानिक काउबॉय’ और ‘संवैधानिक रेम्बो’ करार देते हुए कहा कि खेड़ा की गिरफ्तारी की कोशिश केवल राजनीतिक खुन्नस का नतीजा है.

अमर्यादित भाषा का सवाल !

सिंघवी ने कोर्ट में कहा, “यदि डॉ. अंबेडकर आज जीवित होते और किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा और व्यवहार करते देखते, तो उन्हें बहुत दुख होता.” उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने खुद सार्वजनिक बयानों में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया है.

“क्या खेड़ा कोई आतंकवादी हैं?”

बचाव पक्ष ने दिल्ली में हुई पुलिस कार्रवाई के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए. सिंघवी ने कहा कि खेड़ा के आवास को 50 से 70 पुलिसकर्मियों ने इस तरह घेर लिया था, जैसे वे किसी खूंखार आतंकवादी को पकड़ने आए हों. उन्होंने तर्क दिया कि मानहानि के मामले में, जहां अधिकांश धाराएं जमानती हैं, वहां इतनी भारी पुलिस फोर्स और हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है.

असम सरकार का पलटवार: जाली दस्तावेजों का सनसनीखेज दावा

दूसरी ओर, असम सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया. मेहता ने कोर्ट को बताया कि जांच के दौरान चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.उन्होंने दावा किया कि खेड़ा द्वारा पेश किए गए दस्तावेज (पासपोर्ट) पूरी तरह से ‘फर्जी और जाली’ हैं.

तुषार मेहता ने दलील दी, “किसी भी सरकारी अथॉरिटी ने ये दस्तावेज जारी नहीं किए हैं. पुलिस को यह पता लगाना है कि इन जाली कागजातों के पीछे कौन सा नेटवर्क काम कर रहा है और इसे किसने तैयार किया है. इसके लिए हिरासत में लेकर पूछताछ करना अनिवार्य है.”

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें

असम सरकार जहां इस मामले को एक गंभीर जालसाजी और आधिकारिक मुहरों के गलत इस्तेमाल के रूप में पेश कर रही है, वहीं खेड़ा का पक्ष इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन बता रहा है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. अदालत को ये तय करना है कि पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से राहत मिलेगी या उन्हें पुलिस हिरासत का सामना करना पड़ेगा.

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