Bastar Adivasi Prisoners रायपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल मामलों में जेलों में बंद आदिवासी ग्रामीणों के लिए दिवाली से पहले राहत की उम्मीद जगी है.राज्य सरकार ऐसे करीब 400 से 450 मामलों की समीक्षा कर रही है, जिनमें आरोपियों पर गंभीर अपराधों के बजाय नक्सलियों को राशन पहुंचाने, रेकी करने, पर्चे-बैनर लगाने या दबाव में सहयोग करने जैसे आरोप हैं. समीक्षा के बाद कुछ मामलों में अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है.
सरकार का जोर ऐसे ग्रामीणों के मामलों की पहचान करने पर है, जो कथित तौर पर नक्सली संगठनों के दबाव या मजबूरी में उनके संपर्क में आए थे. हालांकि, इन मामलों में राहत का अंतिम फैसला जांच, कानूनी समीक्षा और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही हो सकेगा. फिलहाल 400 से 450 मामलों को संभावित राहत के दायरे में माना जा रहा है.
450 मामलों की समीक्षा, समिति की रिपोर्ट का इंतजार
बस्तर क्षेत्र में नक्सल मामलों में बंद आदिवासी ग्रामीणों से जुड़े प्रकरणों की समीक्षा की जा रही है. इसके तहत यह देखा जाएगा कि आरोपियों के खिलाफ किस तरह के आरोप हैं, मामले में कौन-कौन सी धाराएं लगाई गई हैं और उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं.
समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद जिला स्तर पर केस डायरी, चार्जशीट और संबंधित कानूनी प्रावधानों की जांच की जाएगी. इसके आधार पर तय होगा कि किन मामलों में अभियोजन वापसी का प्रस्ताव आगे बढ़ाया जा सकता है.
सरकार की इस कवायद को उन ग्रामीणों के लिए संभावित राहत के तौर पर देखा जा रहा है, जो लंबे समय से विचाराधीन मामलों में जेलों में बंद हैं. हालांकि, समीक्षा के दायरे में आने का अर्थ अपने आप रिहाई मिलना नहीं है.
विजय शर्मा ने क्या कहा?
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने हालिया समीक्षा बैठक का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें आरोपियों पर गंभीर अपराध दर्ज नहीं हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, जिन प्रकरणों में नक्सलियों को दबाव या मजबूरी में राशन पहुंचाने अथवा अन्य तरह का सहयोग करने के आरोप हैं, उनमें अभियोजन वापसी की संभावना पर विचार किया जा रहा है. इस दिशा में जल्द आगे का निर्णय लिए जाने की बात भी कही गई है.
सरकार की ओर से मामलों की समीक्षा का उद्देश्य आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तय करना है कि किन प्रकरणों में कानूनी राहत की गुंजाइश है. गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में राहत मिलेगी या नहीं, यह संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा.
बस्तर की जेलों में 1,150 से ज्यादा विचाराधीन बंदी
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बस्तर संभाग की विभिन्न जेलों में नक्सल मामलों से जुड़े 1,150 से अधिक विचाराधीन बंदी हैं. जगदलपुर समेत संभाग की छह जिला जेलों और उप-जेलों से जुड़े मामलों की समीक्षा की जा रही है.
विचाराधीन बंदी वे लोग होते हैं, जिनके मामलों में अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है. ऐसे में उनकी स्थिति का आकलन करते समय आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों, हिरासत की अवधि और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है.
करीब 400 से 450 मामलों की समीक्षा इस लिहाज से अहम मानी जा रही है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने प्रकरणों में अभियोजन वापसी के लिए प्रस्ताव तैयार किया जा सकता है.
15 नवंबर के आसपास शुरू हो सकता है अगला चरण
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 15 नवंबर के आसपास प्रक्रिया के अगले चरण की शुरुआत हो सकती है. इसमें संबंधित मामलों का परीक्षण, अभियोजन वापसी के प्रस्ताव तैयार करना और जरूरी होने पर अदालत में आवेदन प्रस्तुत करना शामिल होगा.
हालांकि, दीपावली से पहले राहत मिलने की उम्मीद के बावजूद यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सभी 400 से 450 मामलों में बंदियों की रिहाई हो जाएगी. समीक्षा पूरी होने, सक्षम स्तर पर प्रस्ताव मंजूर होने और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही प्रत्येक मामले की स्थिति स्पष्ट होगी.
बस्तर में भरोसा बहाली की दिशा में अहम कदम?
बस्तर लंबे समय से नक्सल हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावित रहा है. इस क्षेत्र में ऐसे ग्रामीणों के मामलों की समीक्षा, जिन पर दबाव में नक्सलियों की मदद करने के आरोप हैं, स्थानीय आबादी और प्रशासन के बीच भरोसा मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है.
हालांकि, किसी भी मामले में राहत देते समय गंभीर अपराधों और सामान्य आरोपों के बीच अंतर करना तथा न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होगा. यदि समीक्षा के बाद पात्र मामलों में अभियोजन वापसी का रास्ता साफ होता है, तो संबंधित बंदियों और उनके परिवारों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है.

