CJP Leaders Release : दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद न्यायिक हिरासत में भेजे गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई का मामला लगातार उलझता जा रहा है.जमानत से जुड़ी औपचारिकताओं और जमानतियों के सत्यापन के बाद भी दोनों को रिहा नहीं किया जा सका. पहले सिक्योरिटी बॉन्ड और जमानतियों के दस्तावेजों को लेकर पेच सामने आया, फिर मामले की सुनवाई कर रहे स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) को कथित तौर पर जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आ गया.
दिल्ली पुलिस ने मजिस्ट्रेट की शिकायत के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है. वहीं, CJP की ओर से आरोप लगाया गया है कि उसके नेताओं की रिहाई में लगातार प्रक्रियागत अड़चनें पैदा की जा रही हैं. पार्टी की लीगल टीम का कहना है कि आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद रिहाई के आदेश पर सुनवाई नहीं हो सकी.
इस पूरे घटनाक्रम में अब दो सवाल अहम हो गए हैं—आखिर जमानत से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद भी दोनों नेता जेल से बाहर क्यों नहीं आ सके और SEM को धमकी मिलने के आरोप का उनकी रिहाई की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा?
14 अक्टूबर को जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद हिरासत में भेजे गए थे दोनों नेता
आशुतोष रांका और सौरव दास CJP के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं. दोनों को 14 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था. यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा था.
पुलिस के मुताबिक, जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद दोनों नेताओं ने बैरिकेड पार कर वहां प्रवेश किया था. पुलिस ने इसे नियमों का उल्लंघन बताया। इसके बाद दोनों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.
CJP की ओर से इस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए.पार्टी का कहना है कि उसके नेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई और उनकी रिहाई में आ रही अड़चनें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े व्यापक सवाल खड़े करती हैं. दूसरी ओर, पुलिस का पक्ष है कि कार्रवाई निर्धारित नियमों और कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई.
पहले सिक्योरिटी बॉन्ड और जमानतियों के सत्यापन पर फंसा मामला
दोनों नेताओं की रिहाई की प्रक्रिया में सबसे पहले जमानतियों और सिक्योरिटी बॉन्ड को लेकर विवाद सामने आया.CJP की लीगल टीम के अनुसार, 15 अक्टूबर से ही रिहाई के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा करने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जमानतियों के दस्तावेजों पर बार-बार आपत्तियां उठाई गईं.
पार्टी की लीगल टीम की प्रमुख रत्ना सिंह ने आरोप लगाया कि कई जमानतियों के दस्तावेज जमा करने के बावजूद उन्हें स्वीकार करने में अड़चनें आईं.उनके अनुसार, पुलिस और संबंधित अधिकारियों की ओर से अलग-अलग आधार पर आपत्तियां उठाई गईं, जिससे रिहाई की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी.
हालांकि, पुलिस का पक्ष इससे अलग है.अधिकारियों ने कहा कि जमानतियों के दस्तावेजों में खामियां थीं और नियमानुसार सत्यापन जरूरी था. पुलिस ने रिहाई में जानबूझकर देरी किए जाने के आरोपों से इनकार किया.
SEM को धमकी मिलने के बाद सुनवाई पर लगा ब्रेक
रिहाई की प्रक्रिया के बीच 18 अक्टूबर को मामला तब और उलझ गया, जब स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने कथित तौर पर धमकी मिलने की जानकारी दी. मजिस्ट्रेट को आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई से संबंधित कार्यवाही के दौरान धमकी भरे संदेश मिलने का आरोप है.
दिल्ली पुलिस ने शिकायत के आधार पर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट (NCR) दर्ज की.रिपोर्टों के अनुसार, धमकी देने वाले संदेशों में दोनों नेताओं को तुरंत रिहा करने का दबाव डाले जाने का आरोप भी शामिल है.
मजिस्ट्रेट ने कथित खतरे का हवाला देते हुए मामले की कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया. इससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी और दोनों नेताओं की रिहाई का इंतजार जारी रहा.
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई शुरू की है, लेकिन उपलब्ध जानकारी से यह साबित नहीं होता कि धमकी देने वाले लोग CJP से जुड़े थे या उनका दोनों नेताओं से कोई संबंध था.
रत्ना सिंह ने उठाए सवाल, कहा- तीसरे व्यक्ति की धमकी का रिहाई से क्या संबंध?
CJP की लीगल टीम की प्रमुख रत्ना सिंह ने रिहाई में हो रही देरी पर नाराजगी जताई.उनके अनुसार, 18 अक्टूबर को जमानतियों के सत्यापन और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) से जुड़ी मंजूरी समेत आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली गई थीं.
रत्ना सिंह ने बताया कि उन्हें दोपहर 12 बजे सुनवाई की उम्मीद थी, लेकिन लंबे इंतजार के बाद शाम करीब पांच बजे कार्यवाही शुरू हुई. उनके मुताबिक, उस समय सरकारी पक्ष ने मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने का मुद्दा उठाया और रिहाई से संबंधित मुख्य सवाल पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी.
CJP की लीगल टीम ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति ने मजिस्ट्रेट को धमकी दी है, तो उस व्यक्ति की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए.पार्टी का तर्क है कि किसी अज्ञात तीसरे व्यक्ति के कथित संदेशों के कारण उसके नेताओं की रिहाई अनिश्चितकाल तक नहीं रोकी जानी चाहिए.
हालांकि, धमकी की शिकायत की जांच और दोनों नेताओं की रिहाई की कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग सवाल हैं.इन पर संबंधित अधिकारियों और सक्षम न्यायिक प्राधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेना होगा.
दिल्ली पुलिस ने क्या कहा?
दिल्ली पुलिस ने CJP की ओर से लगाए गए जानबूझकर देरी के आरोपों को खारिज किया है.पुलिस के अनुसार, जमानतियों के दस्तावेजों में खामियां थीं, जिनका सत्यापन आवश्यक था. वहीं, मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने की शिकायत को भी गंभीरता से लिया गया है.
पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर मामले की जांच शुरू की.मजिस्ट्रेट के कथित धमकी भरे संदेशों की जांच के जरिए यह पता लगाने की जरूरत है कि संदेश किसने भेजे, उनका उद्देश्य क्या था और क्या उनका रिहाई की कार्यवाही से कोई वास्तविक संबंध था.
फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि धमकी देने वाले व्यक्ति की पहचान हो गई है या दोनों नेताओं की रिहाई के लिए नई सुनवाई की तारीख तय हो चुकी है.
अभिजीत दीपके ने भी जताई चिंता
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आशुतोष रांका और सौरव दास की हिरासत को लेकर चिंता जताई है.उन्होंने दोनों नेताओं के समर्थन में भावनात्मक संदेश साझा किया और उनके जल्द लौटने की उम्मीद व्यक्त की.
दीपके ने अपने संदेश में दोनों नेताओं के पार्टी के प्रति योगदान और उनके साथ अपने जुड़ाव का जिक्र किया. यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब CJP मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखने की बात कह रही है.
पार्टी का कहना है कि दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी के बावजूद उसका आंदोलन जारी रहेगा. वहीं, रिहाई को लेकर कानूनी प्रक्रिया में आ रही अड़चनें पार्टी और प्रशासन के बीच तनाव का नया कारण बन गई हैं.
अब आगे क्या होगा?
आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई के मामले में आगे की कार्रवाई कई पहलुओं पर निर्भर करेगी. सबसे पहले, जमानतियों के दस्तावेजों और सिक्योरिटी बॉन्ड से जुड़ी आपत्तियों का समाधान होना जरूरी है. इसके बाद सक्षम प्राधिकारी के सामने रिहाई के सवाल पर विधिवत निर्णय होना होगा.
इसके साथ ही मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने की शिकायत की जांच भी आगे बढ़ेगी.पुलिस को यह पता लगाना होगा कि धमकी किसने दी और क्या उसका दोनों नेताओं के मामले से कोई संबंध है.
फिलहाल, 19 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, दोनों नेताओं की रिहाई नहीं हो सकी है. CJP इसे प्रक्रियागत देरी बता रही है, जबकि पुलिस दस्तावेजों की खामियों और मजिस्ट्रेट को कथित धमकी मिलने का हवाला दे रही है.

