Open Letter from 42 Former Judges नई दिल्ली : चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने खुला पत्र जारी किया है. 7 अक्टूबर को लिखे गए इस पत्र को 8 अक्टूबर 2026 को सार्वजनिक किया गया. पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने की अपील की है.
पत्र का शीर्षक “An Open Letter to the People of India: In Defence of Our Constitutional Institutions” है. इसमें पूर्व न्यायाधीशों ने बिना ठोस प्रमाण के संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाए जाने को लेकर चिंता जताई है.
In an open letter, 42 former judges have expressed grave concern over attempts to undermine the Election Commission, judiciary and other constitutional institutions.
The signatories have questioned allegations of “vote theft” without supporting evidence, warning that repeatedly branding constitutional authorities as “thieves” and “compromised” risks eroding public trust in democracy.
“Criticism of institutions is a democratic right. Denigration is not,” the letter states.
— Press Trust of India (@PTI_News) October 8, 2026
Open Letter from 42 Former Judges-‘ओपन लेटर में क्या लिखा है?
पूर्व न्यायाधीशों ने अपने पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा है, “Criticism of institutions is a democratic right. Denigration is not.” यानी संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना नहीं.
पत्र में कहा गया कि चुनाव आयोग के साथ-साथ उच्च न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी लगातार सार्वजनिक आरोपों और हमलों के केंद्र में हैं. हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे अपने आकलन के अनुसार राजनीतिक हितों से प्रेरित अभियान बताया और चेताया कि ऐसी भाषा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के भरोसे को प्रभावित कर सकती है.
‘वोट चोरी’ के आरोपों पर मांगे ठोस सबूत
पूर्व जजों ने “वोट चोरी”, “चोर”, “कठपुतली” और “compromised” जैसे शब्दों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया है. उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया या किसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ लगाए जाने वाले गंभीर आरोपों को उचित कानूनी मंच पर प्रमाण के साथ रखा जाना चाहिए.
पत्र में यह भी कहा गया कि केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक बयान किसी आरोप को प्रमाणित नहीं करते. पूर्व न्यायाधीशों ने राजनीतिक दलों से चुनाव आयोग अथवा अदालतों के सामने सबूत और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी शिकायतें रखने की अपील की है.
SIR को बताया कानूनी प्रक्रिया
खुले पत्र में Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का भी बचाव किया गया है. पूर्व न्यायाधीशों ने इसे मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाने के लिए कानून के तहत होने वाली प्रक्रिया बताया.
पत्र में Representation of the People Act, 1950 की धारा 21(3) और संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण की जिम्मेदारी और अधिकार प्राप्त है.
पूर्व जजों के मुताबिक SIR का उद्देश्य मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट प्रविष्टियों और स्थानांतरित हो चुके लोगों के नामों को हटाने के साथ पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि देश में पहले भी मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण होता रहा है.
‘भरोसा लोकतंत्र की मुद्रा है’
पूर्व न्यायाधीशों ने लोकतंत्र में जनविश्वास को सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक बताया है. पत्र में कहा गया है—
“Trust is the currency of democracy.”
यानी भरोसा लोकतंत्र की मुद्रा है।
पत्र में चेताया गया कि यदि लगातार यह धारणा बनाई जाती रही कि लोगों का वोट मायने नहीं रखता या चुनावी व्यवस्था विश्वसनीय नहीं है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों का विश्वास कमजोर हो सकता है. पूर्व जजों ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाली वास्तविक चिंताओं को भी उचित संवैधानिक और न्यायिक माध्यमों से उठाने की बात कही है.
कौन-कौन पूर्व जज हैं हस्ताक्षरकर्ताओं में?
इस पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल समेत कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के हस्ताक्षर हैं.
हस्ताक्षरकर्ताओं में पूर्व हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश बी.सी. पटेल, सुभ्रो कमल मुखर्जी और परमोद कोहली के नाम भी शामिल हैं. पत्र लिखने वालों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा बनाए रखना है.
विपक्ष के प्रदर्शन के बीच आया पत्र
यह पत्र ऐसे समय सामने आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR को लेकर विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन जारी है. विपक्षी दल मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और “वोट चोरी” के आरोपों को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
वहीं, पूर्व न्यायाधीशों ने इन आरोपों को प्रमाण और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में देखने की जरूरत पर जोर दिया है. उन्होंने कहा है कि चुनावी शिकायतों को संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
संस्थाओं पर भरोसा बनाना सभी की जिम्मेदारी
खुले पत्र में केवल राजनीतिक दलों से ही नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं, मीडिया और आम नागरिकों से भी लोकतांत्रिक विश्वास बनाए रखने की अपील की गई है. पूर्व जजों ने कहा कि संस्थाओं को पारदर्शी रहना चाहिए, वास्तविक शिकायतों का समाधान करना चाहिए और नागरिकों को किसी भी दावे पर विश्वास करने से पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए.
SIR और चुनाव आयोग को लेकर जारी बहस अब राजनीतिक मंच के साथ-साथ संवैधानिक और कानूनी विमर्श का भी विषय बन गई है. ऐसे में 42 पूर्व न्यायाधीशों का यह खुला पत्र चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतंत्र में जनता के भरोसे के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ले आया है.
पत्र में किसी का हस्ताक्षर ना होने पर उठे सवाल
समाचार एजेंसी PTI ने अपने एक्स एकाउंट पर ये चिट्ठी जारी की है, जिसमें कहा गया है कि ये पत्र 42 जजों के द्वारा लिखा गया है लेकिन पत्र में किसी के हस्ताक्षर दिखाई नहीं दे रहे हैं. अब इसी पत्र को लेकर सोशल मीडिया पर ये सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर ये किस तरह का पत्र है जिसमें किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं.
हस्ताक्षर रहित चिट्ठी जारी कर PTI किसके लिए नैरेटिव बिल्ड कर रहा है?
PTI जिस लेटर को 42 पूर्व जजो की तरफ से जारी कर रहा है जिसमें संवैधनिक संस्थाओं पर आरोपों पर चिंता जताई जा रही है उसमें हस्ताक्षर ही नहीं हैं!
#EC #ElectionCommission #Judges #Votetheft
— Prem Kumar (दिमागी नक्सल) (@AskThePremKumar) October 8, 2026

