मनमानी पर प्रशासन का हंटर: गढ़वा में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी खत्म, फीस बढ़ाने पर लगी 10% की ‘लक्ष्मण रेखा’

 गढ़वा |   झारखंड के गढ़वा जिले में निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा मनमाने ढंग से शुल्कों में बढ़ोतरी, दोबारा दाखिले (री-एडमिशन) के नाम पर वसूली और विशेष दुकानों से किताबें व पोशाक (यूनिफॉर्म) खरीदने के लिए बाध्य कर अभिभावकों के आर्थिक शोषण की मिल रही शिकायतों पर जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा की अगुवाई में जिला स्तरीय शुल्क नियामक समिति की एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में स्कूल प्रबंधकों, अभिभावकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की दलीलें सुनने के बाद उपायुक्त ने निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए फीस वृद्धि की एक निश्चित सीमा (लक्ष्मण रेखा) निर्धारित कर दी है।

ट्यूशन और एनुअल फीस बढ़ोतरी की सीमा तय

झारखंड शिक्षा न्यायाधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2017 के कानूनी प्रावधानों के तहत प्रशासन द्वारा कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। नए नियमों के अनुसार, अब जिला क्षेत्र का कोई भी निजी स्कूल एक शैक्षणिक वर्ष में अपनी ट्यूशन फीस में 10 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी नहीं कर सकेगा। इसके साथ ही, सालाना तौर पर ली जाने वाली एनुअल फीस में की जाने वाली वृद्धि भी संबंधित छात्र की ट्यूशन फीस के अधिकतम 15 प्रतिशत की राशि से ऊपर नहीं होनी चाहिए, जिससे अभिभावकों पर अचानक बड़ा आर्थिक बोझ न पड़े।

स्कूलों के लिए पारदर्शिता और यूनिफॉर्म-किताबों पर नियम

प्रशासन ने आदेश दिया है कि सभी स्कूलों को अपनी वार्षिक फीस का पूरा विवरण (ब्रेकअप) सार्वजनिक करना होगा, ताकि किसी भी प्रकार का छिपा हुआ शुल्क (हिडन चार्ज) न लिया जा सके। इसके अलावा, कोई भी विद्यालय प्रबंधन 5 वर्ष की अवधि से पहले अपने छात्रों की यूनिफॉर्म (पोशाक) के रंग या डिजाइन में बदलाव नहीं कर सकेगा। सबसे बड़ी राहत देते हुए यह भी साफ किया गया है कि अभिभावक खुले बाजार के किसी भी बुक स्टोर से किताबें खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं और स्कूल उन्हें किसी चुनिंदा या चिन्हित दुकान से सामग्री लेने के लिए विवश नहीं कर सकते।

बैठक में दोनों पक्षों की दलीलें और प्रशासनिक उपस्थिति

समीक्षा के दौरान निजी स्कूल संचालकों और प्राचार्यों ने तर्क दिया कि एनुअल चार्ज के माध्यम से ही परीक्षा का आयोजन, स्कूल भवन का रख-रखाव, शिक्षकों का पीएफ, ग्रेच्युटी, होल्डिंग टैक्स और बिजली बिल जैसे बड़े खर्चों का भुगतान किया जाता है, तथा उन्होंने दावा किया कि प्रवेश शुल्क केवल पहली बार ही लिया जाता है। इस पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि सुविधाओं के नाम पर अभिभावकों की जेब को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस उच्च स्तरीय बैठक में जिला शिक्षा पदाधिकारी कैसर रजा, जिला शिक्षा अधीक्षक अनुराग मिंज सहित विभिन्न विद्यालयों के प्रबंधक, प्रधानाचार्य, शिक्षक और छात्र-अभिभावक संघ के प्रतिनिधि मुख्य रूप से शामिल थे।

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