Politics & saints : राजनीति में बाबाओं और नेताओं का गठजोड़, किसपर भरोसा करें जनता

भारतीय राजनीति का ये भक्ति काल है. भक्ति काल से हमारा मतलब ट्रोल और उनके आकाओं से नहीं है. हम बात कर रहे है संतों-महंतों की, बाबाओं और बापुओं की. इनमें से कुछ भगवे कपड़े में हैं तो कुछ सफेद चोले में. कुछ सीधे राजनीति में दखल रखते हैं तो कुछ ने राजनेताओं को ही भक्त बना रखा है.

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राष्ट्रपति मुर्मू ने सद्गुरु को बताया “ऋषि ऑफ़ मॉडर्न टाइम्स”

18 फरवरी महाशिवरात्रि के मौके पर भारत की पहली नागरिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ईशा योग केंद्र, कोयम्बटूर पहुंची. राष्ट्रपति मुर्मू ने यहां महाशिवरात्रि के कार्यक्रम में शिरकत की और सद्गुरु को “ऋषि ऑफ़ मॉडर्न टाइम्स” कह डाला. इससे पहले खुद प्रधानमंत्री भी ईशा योग केंद्र के कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं. बड़े-बड़े नेताओं से लेकर सिनेमा के स्टार्स तक सदगुरु को प्रणाम करने आते-जाते रहे हैं. फिलहाल सदगुरु देश के सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं. लाखों करोड़ों फॉलोवर वाले सदगुरु का सीधे राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है लेकिन बीजेपी नेताओं के वो कितने करीब हैं ये किसी से छुपा नहीं है.

2014 में मोदी के समर्थन में मैदान में उतरे थे कई गुरु

सदगुरु की तरह ही नाम आता है श्री श्री रवि शंकर का. आर्ट ऑफ लीविंग की शिक्षा देते-देते कब श्री श्री की राजनीति (Politics & saints) में रुचि हो गई कहना मुश्किल है लेकिन श्री श्री उन आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं जिन्होंने वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी के कैंपेन में मदद की थी. श्री श्री ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से काला धन वापस आएगा. टैक्स कम होंगे. पेट्रोल-डीज़ल सस्ता होगा. क्या कम हुआ और कितना काला धन विदेशों से आया हमसे बेहतर आप जानते हैं लेकिन हां दिल्ली में यमुना के किनारे आर्ट ऑफ लिविंग सिखाने के दौरान जो इन्होंने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया था उसका 5 करोड़ का जुर्माना ज़रूर सरकारी खज़ाने में अभी तक नहीं आया है.
श्री श्री रविशंकर के साथ ही एक और गुरु भी मोदी की इस कैंपेन में शामिल थे. ये आध्यात्म को तो नहीं जानते लेकिन शरीर को लेकर काफी सजग हैं. पहले योगा से लोगों को स्वास्थ्य लाभ कराते थे और अब पातंजलि के शुद्ध खाने पीने के सामान बेच रहे हैं. हलांकि जबसे रामदेव ने पातंजलि स्टोर खोले हैं लोग उन्हें बाबा राम देव की जगह लाला रामदेव कहने लगे हैं. रामदेव का पतन ऐसे भी हुआ कि राजनीति (Politics & saints) में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन के पोस्टर ब्वाय से वो राजस्थान में हेट स्पीच देने तक पहुंच गए.

हिंदूवादी पार्टियों के चहेते है बापू, गुरु और बाबा

इनके अलावा मुरारी बापू, आसाराम, राम रहीम कई ऐसे नाम हैं जिनके लाखों की संख्या में भक्त और शिष्य हैं. इनके दरबारों में राजनेता भी हाथ बांधे खड़े रहते हैं. आजकल एक ऐसा ही दरबार काफी चर्चा में भी है. दरबार है बागेश्वर धाम का जिसके पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री आजकल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. धीरेंद्र शास्त्री की शुरुआत तो चमत्कार से हुई थी लेकिन जल्द ही हिंदू राष्ट्र का नारा देकर वो हिंदूवादी पार्टियों (Politics & saints) के चहेते हो गए. दरबार में भीड़ भी बढ़ गई हलांकि अब उसका उलटा असर भी हो रहा है. अपने नंबर का इंतज़ार करते-करते तीन लोग तो अपनी जान भी गवां बैठे हैं. कहने को राजनीतिक दल भले ही ऊपरी तौर पर साधु-महात्माओं को राजनीति से दूर रहने की नसीहत दे रहे होते हैं लेकिन हकीकत यह है कि तमाम महंत बड़े दलों में अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाने से पीछे नहीं हट रहे हैं.

हरियाणा सरकार तो बाबा के दरबार में नतमस्तक नज़र आई

हरियाणा सरकार तो खुलकर बलात्कार और हत्या के सजायाफ्ता बाबा राम रहीम के साथ नजर आती है. कई बार पेरोल पर छूटे बाबा के दरबार में बीजेपी के नेता खड़े नज़र आए. वो भी तब जब मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर राम रहीम को इसलिए पेरौल दिलाने का आरोप था ताकी वो हरियाणा चुनाव में बीजेपी की मदद कर पाए.

कांग्रेस काल में राजनीति में बढ़ा संतों-महंतों का दखल

हलांकि हाल फिलहाल के मामलों में तो बीजेपी ही इन साधु-संतों और महात्माओं और बाबाओं के साथ खड़ी नज़र आती है लेकिन इस चलन की शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी. विवादित तांत्रिक और धर्मगुरु चंद्रास्वामी का नाम तो याद ही होगा आपको. एक वक्त ऐसा था कि सत्ता के गलियारों की चाबी समझे जाते थे चंद्रस्वामी. पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के करीबी, इस तांत्रिक के रिश्ते देश-दुनिया के कर्इ हस्तियों से बेहद करीबी थे. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से लेकर 1995 में दुनिया भर के मंदिरों में गणेश जी के दूध पीने के मामले में इनका नाम शामिल था.
वैसे तो संतों-महंतों की तूती राजनीति (Politics & saints) में 1991 के चुनावों से ही बोलने लगी थी. जब राम मंदिर का मुद्दा अपने चरम पर था तब राजनीति में इन संतों-महंतों का भी बोलबाला हो गया था. एक तरफ जहां कांग्रेस ने इन संतों को सीधे चुनावी टिकट देकर ही इनके शिष्यों को अपना वोटर बना लिया था. वहीं, दूसरी ओर गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ जैसे कुछ संत ऐसे भी थे जिन्होंने कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर चुनावी मैदान में उतरना भी शुरू कर दिया था. पर, जितने बड़े पैमाने पर साधु-संतों की भूमिका 1991 के चुनाव में दिखी, उससे पहले कभी नहीं देखी गई थी.
अगर बीजेपी ने हिंदू साधु संतों का इस्तेमाल किया तो विपक्षी मंचों पर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सहित कई मुस्लिम संस्थाओं के प्रमुख, मौलाना और उलेमा भी नज़र आए.

कॉर्पोरेट नुमा संस्थानों वाले गुरुओं के सामने मजबूर हो गए है राजनीतिक दल

1991 और आज के समय में अगर कुछ फर्क आया है तो वो ये है कि पहले राजनेता इन साधु संतों का राजनीति में इस्तेमाल करते थे. अब ये साधु संत राजनीतिक दलों का अपने हित के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई है कि राजनीतिक पार्टियां कई बार तो चाहकर भी इनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाती हैं. हाल के दिनों में होने वाली धर्म संसदें इसका जीता जागता उदाहरण है. जहां खुलकर हिंसा की बात हो रही है लेकिन सरकार और राजनीतिक दल मौन है और ये हाल तब है जब सुप्रीम कोर्ट प्रशासन को इनके खिलाफ एक्शन लेने को कह चुका है. इतना ही नहीं बलात्कार और हत्या के आरोप साबित होने के बाद भी राजनेता इतने मजबूर हो गए हैं कि वो इन स्वयं भू बाबाओं के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाते. फिर चाहे वो राम रहीम हो या आसाराम. बीजेपी ही नहीं दूसरी विपक्षी पार्टियां भी इनके अनुयायियों को नाराज़ नहीं करने के चक्कर में इतने गंभीर मामलों में जेल की सलाखों के पीछे होने के बाद भी इन बाबाओं को खिलाफ कुछ भी कहने से बचती है.
यानी पहले ये राजनेताओं के लिए वोट जुटाने का साधन थे. अब लाखों करोड़ों के मालिक बने ये आध्यात्मिक, योग और चमत्कारी साधु राजनीति का इस्तेमाल (Politics & saints) अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. कारोबारी संस्थाओं की तरह इनके संस्थान देश-दुनिया में फैले हैं और करोड़ों अरबों के अपने साम्राज्य का इस्तेमाल ये अपनी पसंद के नेताओं और पार्टियों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं. यानी अपने भक्तों के साथ-साथ अब ये धन बल का भी भरपूर इस्तेमाल कर राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचा रहे हैं. अगर ये कहा जाए की धर्म और आस्था के केंद्र बने ये साधु-संत सत्ता के गलियारों की सीढ़ी बन गए हैं तो कुछ गलत नहीं होगा.

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