उत्तर प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा है. सबकुछ सुलभ और उपलब्ध है. विकास की गंगा बह रही है. कानून व्यवस्था बुलडोज़र के भरोसे है इसलिए प्रशासन के पास काम नहीं बचा है तो उसे रामनवमी के आयोजन करवाने में लगाया गया है. जी हां इस साल नवरात्र में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी का आयोजन सरकारी खर्च पर होगा, सरकार ने हर जिले को इसके लिए 1-1 लाख रुपये दिए है और डीएम को इन आयोजनों का करता धरता बनाया है. ऐसे में जब सब कुछ इतना दुरुस्त है तो कोई फिजूल में विकास- डेवलपमेंट करने सवाल पूछेगा तो मंत्री को गुस्सा तो आएगा न.
आप सही समझे हमारा इशारा संभल के स्थानीय पत्रकार संजय राणा की ओर है. राणा के हाथ पुलिस ने कानून की रस्सी से बांध दिए है और मुंह पर आरोपों की कालिख पोत दी है. पुलिस ने एक स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता की शिकायत पर संजय राणा को, सरकारी काम में बाधा डालने , बीजेपी नेता और मंत्री से बदसलूकी करने, बीजेपी नेता के साथ मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार किया है. अब ये स्थनीय पत्रकार संभल के चंदौसी थाने में है जहां इसपर ये केस दर्ज किया गया है. चलिए आपको बताते है इस दुष्ट जो खुद को स्थानीय पत्रकार और यू ट्यूबर बताता है ने असल में गुस्ताखी क्या की थी.
मामला 13 मार्च का है. संभल के बुधनगर में शिक्षा मंत्री गुलाब देवी का कार्यक्रम था. इस कार्यक्रम में संजय राणा मंत्री गुलाब देवी से सवाल करने लगा. सवाल ये था कि आपने चुनाव से पहले यहां की सड़क को ठीक करने का वादा किया था, कहा था कि चुनाव जीतने के बाद फिर से आयेंगी, आपने मंदिर पर खड़े होकर शपथ लिया थी लेकिन ना तो गांव में सड़क बनी और ना आप वापस आई ? इतना ही नहीं इसने कहा कि गांव में बारात घर भी नहीं है. संजय राणा में अपनी बात के समर्थन में वहां मौजूद लोगों के हाथ भी उठवा दिए. संजय राणा को लगा कि बतौर पत्रकार उसका धर्म है कि वो जन प्रतिनिधियों को स्थानीय समस्याओं से अवगत कराए. विकास को लेकर उनसे सवाल पूछे. लेकिन मंत्री जी उनकी नज़र को पहले ही भाप गई थी. उन्होंने पत्रकार से कहा भी कि मैं तुम्हारी नज़र को दूर से ही पहचान गई थी. उन्होंने पत्रकार से कहा कि मीडिया के जैसे सवाल पूछो….राणा को लगा वो विलुप्त होती पत्रकार बिरादरी की बात कर रही है. उसने फिर विकास को लेकर सवाल दाग दिया. मंत्री जी नाराज़ हो गई. मूर्ख पत्रकार और मंत्री महोदय में बहस हो गई. या ये कहिए की हंगामे की स्थिति पैदा हो गई. तब किसी तरह आयोजकों ने मामले को संभाल लिया लेकिन एक दिन बाद यानी 14 मार्च को पुलिस पत्रकार को रस्सी से बांध के थाने ले आई. अब उसे ये समझाया जाएगा की पत्रकारों की हाइब्रिड वैरायटी बनो…….या तो गोदी में बैठो या फिर खामोश रहो.
राणा से पहले भी एक स्थानीय पत्रकार को पुलिस ने ये पाठ पढ़ाया था. सितंबर 2019 में मिर्ज़ापुर के पवन जयसवाल ने भी सवाल पूछने की गलती की थी. उसे मिर्जापुर जिले के विकास खंड जमालपुर के प्रथमिक विद्यालय शिउर में नमक रोटी खाते बच्चों पर दया आ गई. बस फिर क्या था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. सरकार और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चलने लगा. पवन बेचारा तब भी जेल में था. मामले बढ़ा तो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की टीम मिर्जापुर पहुंच गई. तब पुलिस ने बताया कि उसने पवन को इस मामले में केलीन चिट दे दी है.
खैर इस घटना के बाद किसी भी गांव कस्बे या जिले से मिड डे मील को लेकर शिकायत नहीं आई. उम्मीद है जब तक संजय राणा की रिहाई होगी तब तक सरकार की सवाल पूछो जेल जाओ नीति का भी अच्छा प्रचार प्रसार हो जाएगा और कोई मूर्ख पत्रकार विकास जैसे मुद्दे पर सवाल पूछकर जेल नहीं जाएगा.
वैसे सवाल पूछने पर पाबांदी नहीं है. आप सवाल पूछ सकते हैं. ज़ोर से चिल्ला के…..गुस्सा दिखा के….धमकाते हुए आप सवाल पूछिए अरविंद केजरीवाल से पूछिए…..भूपेश बघेल से पूछिए…..केसीआर से पूछिए…..ममता बैनर्जी से पूछिए……अशोक गेहलोत से भी पूछ सकते हैं….. आप जनता से भी सवाल कर सकते हैं कि आखिर जब वो सब्सिडी मांगती है तो उसे शर्म क्यों नहीं आती है. मुफ्तखोरी के चक्कर में देश बरबाद हो रहा है. आखिर जनता ने देश के लिए ऐसा किया क्या है कि सरकार से उसे सब्सिडी की उम्मीद है. अपने लिए तो सभी कमाते हैं देश के लिए कमाओ तो बात है. पेट्रोल डीजल सस्ता दुनिया के लिए होता है…..देश की जनता का धर्म है कि वो महंगा तेल खरीद सरकार के खजाने में अपना योगदान दे.
और सवाल पूछने वाले मुद्दे पर ये जरूर याद रखें कि ये पत्रकारिता का नया युग है इसमें चाटुकार पत्रकारिता ही पसंद की जाती है. इसलिए सवाल पूछ के एक्सपेरिमेंट न करें. रामराज्य का आनंद लें. धर्म कर्म में अपना मन लगाएं.

