Tuesday, March 3, 2026

CBSE EXAM -2023: हाथों की जगह पैरों में कलम….पैरों से लिखकर दसवीं की परीक्षा दे रहा है एक छात्र

बेतिया : जीवन में अक्सर ऐसे मौके आते हैं जब हममें से ज्यादातर लोग मुश्किल हालात में कमियों का रोना रोते हैं और मुश्किलों का समाना करने से खुद को बचा लेते हैं,लेकिन हमारे ही समाज में कुछ लोग हैं जिन्होंने ठान लिया है कि वो मुश्किलों का सामना इतनी हिम्मत और जज्बे़ के साथ करेंगे कि मुश्किलें भी उन्हें देख कर अपना रास्ता बदल लेंगी.

बेतिया के गोपाल की चर्चा खूब हो रही है चर्चा

जी हां ऐसे ही एक इच्छाशक्ति के धनी एक बच्चे की कहानी बेतिया से सामने आयई है.इन दिनों बेतिया के एक परीक्षा केंद्र पर सभी लोगों की नजर गोपाल पर है. गोपाल दसवीं की परीक्षा दे रहा है. जहां आम बच्चे अपने हाथों से परीक्षा के पेपर लिख रहे हैं वहीं गोपाल अपनी परीक्षा की कॉपी पैरों से लिख रहा है.

GOPAL BETIYA

कौन है गोपाल,क्यों पैरों से लिखने के लिए है विवश ?

गोपाल पैरों से लिखकर कोई स्टंट नहीं कर रहा है बल्कि ये बालक बचपन ने दिव्यांग है. इसके हाथ नहीं हैं. हाथ ना होने के बावजूद गोपाल अपने आप को दूसरे बच्चो से कम नहीं मानता है. गोपाल का जज्बा और प्रबल इच्छा शक्ति का नतीजा है कि ये बालक बिल्कुल सामान्य बच्चों की तरह बैठकर परीक्षा की कॉपी लिख रहा है.

गोपाल पश्चिमी चंपारण के बेतिया का रहने वाला है. माता पिता सामान्य किसान हैं और वो अपने भाइ बहनों में सबसे बड़ा है. दरअसल गोपाल बचपन से ही दिव्यांग था. जन्म के समय उसके हाथ की जगह पर केवल एक छोटा सा मांस का हिस्सा था. समय के साथ गोपाल के शरीर का तो विकास हुआ लेकिन उसके हाथ का विकास नहीं हुआ.

हाथ ना होने पर पैरों से अपने काम करना सीखा

जन्म से ही दिव्यांग होने के कारण गोपाल को अपनी हर जरुरत के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था. इस बच्चे ने अपनी इस परेशानी का हल अपने आप ढूंढा और अपने पैरों को ही अपना हाथ बना लिया. दिनचर्या के कामों को वो पैरों से करने लगा. धीरे धीरे पैरों से लिखना भी सीख लिया.अब उसकी दिव्यांगता उसके व्यक्तित्व के विकास में आडे नहीं आती है बल्कि वो सामान्य बच्चों की तरह ही अपनी पढ़ाई लिखाई कर रहा है. गांव के स्कूल से ही प्रारंभिक पढ़ाई की है और अब बगहा से स्कूल से दसवीं की परीक्षा दे रहा है.

पढ़ लिख कर शिक्षक बनना चाहता है गोपाल

दसवीं की परीक्षा दे रहा गोपाल आगे और पढ़ाई करना चाहता है और उच्च शिक्षा लेकर वो एक शिक्षक बनना चाहता है. गोपाल को अपनी मातृ भाषा हिंदी बेहद पसंद है और वो हिंदी का ही शिक्षक भी बनना चाहता है.

गोपाल आज अपने इलाके में बच्चों के बीच प्रेरणा का स्रोत है. यहां जो भी बच्चे किसी तरह की विकलांगता/ दिव्यांगता के शिकार हैं वो गोपाल से प्रेरण लेकर आगे बढ़ रहे हैं. सच ही कहा गया है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो शरीर की दिव्यांगता किसी को जीवन में आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. गोपाल इस कथ्य को पूरी तरह से साबित कर रहा है.

 

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