मंगलवार को गुजरात हाईकोर्ट में मोरबी पुल हादसे के मामले में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुल के रखरखाव के लिए जैसा ठेका दिया गया था उसकी आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि लगता है इस मामले में बिना टेंडर के ठेका दिया गया था.
कोर्ट ने मुख्य सचिव से सवाल किया कि पुल की मरम्मत के लिए टेंडर क्यों नहीं निकाला गया था. क्यों नहीं बोली लगवाई गई थी. कोर्ट ने इस मामले में मोरबी नगर पालिका को भी आड़े हाथों लिया. कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि नोटिस के बावजूद नगर पालिका ने कोर्ट में आना ज़रुरी नहीं समझा. कोर्ट ने कहा “वे ज्यादा होशियार बन रहे हैं, बल्कि उन्हें सवालों के जवाब देने चाहिए.”
‘नगर निकाय ने 135 लोगों को मार डाला ‘
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान नगर पालिका पर कड़ी टिप्पड़ी करते हुए कहा कि इस हादसे के लिए मोरबी नगर पालिका जिम्मेदार है. नगर पालिका ने ओरेवा ग्रुप को 15 साल का ठेका दिया था, उस ओरेवा ग्रुप को जो कि अजंता ब्रांड की वॉल क्लॉक बनाने के लिए जाना जाता है. कोर्ट ने आगे कहा, “नगर पालिका ने चूक की, उसकी चूक के चलते 135 लोगों की जान गई. कोर्ट ने पूछा क्या नगर पालिका ने गुजरात नगर पालिका अधिनियम, 1963 का पालन किया था.”
कोर्ट ने पूछे कई अहम सवाल
अदालत ने सुनवाई के दौरान कई सवाल खड़े किए और कड़ी टिप्पणियां भी की. कोर्ट ने कहा, “इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए महज डेढ़ पेज में एग्रीमेंट कैसे पूरा हुआ? क्या बिना किसी टेंडर के अजंता कंपनी को राज्य की तरफ से मदद दी गई?”
आपको बता दें इस हादसे का कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. कोर्ट ने इस मामले में छह से ज्यादा सरकारी विभागों से जवाब मांगा था. मामले की सुनवाई खुद मुख्य न्यायाधीश अरविंद कुमार और जस्टिस आशुतोष जे शास्त्री कर रहे हैं. अदालत ने पहले दिन ही अनुबंध की फाइलें सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में जमा करने के आदेश दिए थे.
कोर्ट के इतने सख्त रवैये के बावजूद सरकार ने इस मामले में अब तक ओरेवा ग्रुप के सिर्फ कुछ कर्मचारियों जिसमें गार्ड भी शामिल है उनको गिरफ्तार किया गया. ओरेवा ग्रुप के जिन अधिकारियों ने इस 7 करोड़ के इस टेंडर पर दस्तखत किए थे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. इतना ही नहीं इस टेंडर के 2017 में खत्म होने के बाद भी नगर पालिका ने नया टेंडर निकालने या पुल का निरीक्षण करना जरूरी नहीं समझा.

