नई दिल्ली। शिवसेना पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े बेहद संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने जोरदार दलीलें पेश कीं। करीब आधे घंटे तक चली इस बहस के बाद शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दिवाली के बाद कराने का फैसला किया है।
विधानसभा अध्यक्ष के क्षेत्राधिकार पर जोर
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील ध्रुव मेहता ने विधायकों की अयोग्यता के विषय पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता से जुड़े किसी भी विषय पर अंतिम निर्णय लेने का पूरा अधिकार केवल विधानसभा अध्यक्ष के पास ही होता है। इसके साथ ही उन्होंने दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल को ही अपना व्हिप नियुक्त करने का संवैधानिक अधिकार है।
भरत गोगावले की नियुक्ति और जारी व्हिप को बताया वैध
शिंदे गुट का पक्ष रखते हुए अदालत में कहा गया कि एकनाथ शिंदे ही शिवसेना विधायक दल के वास्तविक नेता थे, और उन्हीं के नेतृत्व में 21 जून 2022 को बुलाई गई बैठक में बहुमत के आधार पर भरत गोगावले को मुख्य सचेतक बनाया गया था। इस आधार पर गोगावले द्वारा जारी किया गया हर निर्देश और व्हिप पूरी तरह से कानूनी रूप से सही और वैध था।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद अयोग्यता की मांग को बताया बेमानी
ध्रुव मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तर्क भी रखा कि चूंकि अब विधानसभा का कार्यकाल पूरा समाप्त हो चुका है, इसलिए ऐसी स्थिति में विधायकों को अयोग्य ठहराने से जुड़ी याचिकाएं और मांगें पूरी तरह से निष्फल व बेमानी हो जाती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अयोग्यता का यह पूरा मामला चुनाव चिह्न से जुड़े व्यापक विवाद से भी सीधा संबंध रखता है।

