लंदन। इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दस्तावेज दर्ज है, जिसके महज 67 शब्दों ने पश्चिम एशिया की पूरी तस्वीर और वहां की राजनीति की दिशा बदल कर रख दी। ब्रिटिश सरकार द्वारा तैयार किया गया यह एक साधारण सा पत्र था, जिसे 'बालफोर घोषणापत्र' के नाम से जाना जाता है। यह वही ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसे आज भी इजराइल और फिलिस्तीन के बीच सदियों से चले आ रहे खूनी संघर्ष और तनाव की मुख्य जड़ माना जाता है।
बालफोर घोषणापत्र और ब्रिटेन का आधिकारिक समर्थन
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, 2 नवंबर, 1917 को तत्कालीन ब्रिटिश विदेश मंत्री आर्थर बालफोर ने ब्रिटिश यहूदी समुदाय के प्रभावशाली नेता लॉर्ड वाल्टर रोथ्सचाइल्ड को एक पत्र प्रेषित किया था। इसी पत्र को बालफोर घोषणापत्र कहा जाता है, जिसके माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत ने फिलिस्तीन की भूमि पर यहूदियों के लिए एक अलग राष्ट्र या घर बसाने के विचार का आधिकारिक समर्थन किया था। इस छोटे से पत्र के जरिए पहली बार दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत ने ज़ायोनिस्ट (यहूदी राष्ट्र) आंदोलन को खुलकर अपनी सहमति प्रदान की थी।
पत्र में निहित प्रावधान और ब्रिटेन के रणनीतिक हित
उस पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि ब्रिटिश सरकार फिलिस्तीन में यहूदी समुदाय के लिए एक राष्ट्रीय आवास की स्थापना का समर्थन करती है और इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु हरसंभव प्रयास करेगी। हालांकि, पत्र में यह भी जोड़ा गया था कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाएगा जिससे फिलिस्तीन में पहले से रह रहे गैर-यहूदी समुदायों के धार्मिक और नागरिक अधिकारों को कोई क्षति पहुंचे। ब्रिटेन के इस कदम के पीछे मात्र मानवीय सहानुभूति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे प्रथम विश्व युद्ध में यहूदी समुदाय का समर्थन प्राप्त करना, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्वेज नहर की सुरक्षा को मजबूत करना और वैज्ञानिक सहायता हासिल करना जैसे तीन बड़े भू-राजनीतिक कारण छिपे हुए थे।
जनसांख्यिकी में बदलाव और इजराइल का उदय
प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की पराजय के बाद राष्ट्र संघ ने फिलिस्तीन पर शासन करने का अधिकार ब्रिटेन को सौंप दिया था। ब्रिटेन की नीतियों के परिणामस्वरूप दुनिया भर से यहूदी लोग बड़े पैमाने पर फिलिस्तीन आकर बसने लगे। वर्ष 1917 में जहां फिलिस्तीन की कुल आबादी में यहूदियों की संख्या मात्र तीन से दस प्रतिशत के बीच थी, वह बढ़कर 1947 तक लगभग तैंतीस प्रतिशत तक पहुंच गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लगातार बढ़ती हिंसक झड़पों से आजिज आकर ब्रिटेन ने वर्ष 1947 में फिलिस्तीन का यह जटिल मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के पाले में डाल दिया। इसके पश्चात 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 181 के तहत फिलिस्तीन को एक यहूदी और एक अरब राज्य में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया। अंततः 14 मई, 1948 को ब्रिटिश शासन की समाप्ति के साथ ही यहूदी नेतृत्व ने स्वतंत्र इजराइल राष्ट्र के गठन का ऐलान कर दिया, जिसके तुरंत बाद प्रथम अरब-इजराइल युद्ध भड़क उठा और फिलिस्तीनियों के लिए 'नकबा' यानी बर्बादी के एक नए दौर की शुरुआत हुई।

