तीन महीने बाद भी निर्णय नहीं, छत्तीसगढ़ी भाषा में शिक्षा के मुद्दे पर हाईकोर्ट नाराज

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के शासकीय विद्यालयों में प्राथमिक एवं उच्च स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के संबंध में अदालत द्वारा पूर्व में स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद कोई निर्णयात्मक कदम न उठाने पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह को इस आदेश की अवहेलना करने पर अवमानना का नोटिस जारी किया है और निर्धारित समयावधि के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी और अवमानना का आधार

पूर्व की सुनवाइयों के दौरान उच्च न्यायालय ने राज्य शासन को यह स्पष्ट आदेशित किया था कि वह आगामी तीन माह के भीतर विद्यालयों में छत्तीसगढ़ी भाषा के पठन-पाठन को शुरू करने के विषय में समुचित निर्णय ले। हालांकि, शासन स्तर पर निर्धारित समयावधि बीत जाने के उपरांत भी इस दिशा में न तो कोई प्रशासनिक नीति तैयार की गई और न ही कोई ठोस पहल अमल में लाई गई। चूंकि आईएएस अधिकारी डॉ. कमलप्रीत सिंह वर्तमान में स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव पद का दायित्व संभाल रहे हैं, इसलिए अदालत के आदेशों के पालन में विफल रहने पर उनके विरुद्ध अवमानना याचिका के तहत यह नोटिस जारी किया गया है।

याचिका के संवैधानिक बिंदु और राजभाषा का दर्जा

यह कानूनी विवाद छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी से जुड़े बिलासपुर निवासी याचिकाकर्ता शीतल पाटनवर द्वारा उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गई जनहित याचिका से जुड़ा हुआ है। याचिका में इस महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया गया था कि छत्तीसगढ़ी भाषा को वर्ष 2008 में ही राज्य की आधिकारिक राजभाषा का दर्जा प्रदान किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त, देश में लागू नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी यह प्रावधान है कि बच्चों को उनकी स्थानीय मातृभाषा में ही प्रारंभिक शिक्षा दी जानी चाहिए। इसके साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 (क) का हवाला देते हुए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने की अनिवार्यता पर जोर दिया गया था। इन तमाम संवैधानिक व वैधानिक आधारों पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने पूर्व में सरकार को समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया था, किंतु शासन की ओर से कोई अनुपालन न होने पर याचिकाकर्ता को अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी।

मातृभाषा में शिक्षा और रोजगार की पुरजोर मांग

याचिकाकर्ता शीतल पाटनवर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी हमारी अपनी जननी भाषा है और इस प्रदेश में शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में इस भाषा की उपेक्षा होना बेहद चिंताजनक है। उन्होंने राज्य के स्थापना दिवस के पावन अवसर पर सरकार से यह मांग की थी कि प्रदेश के सभी विद्यालयों में पहली कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक छत्तीसगढ़ी भाषा की शिक्षा को अनिवार्य किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने मांग उठाई कि छत्तीसगढ़ी भाषा में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की डिग्री प्राप्त करने वाले युवाओं के लिए रोजगार के समुचित अवसर सृजित किए जाएं। याचिकाकर्ता का मानना है कि जब तक मातृभाषा को उसका वास्तविक अधिकार नहीं मिलता, तब तक राज्योत्सव का यह पर्व पूर्णतः सार्थक नहीं हो सकता।

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