चुनाव से पहले पांच राज्यों में अफसरों के तबादले की तैयारी,3 साल से एक जिले में जमे अधिकारियों पर गिरेगी गाज!

Election Commission Transfer Order नई दिल्ली: अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव से जुड़े अधिकारियों की तैनाती और तबादलों को लेकर निर्देश जारी किए हैं. गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लंबे समय से एक ही जिले में तैनात अधिकारियों को दूसरी जगह भेजने की तैयारी है. आयोग की नीति के मुताबिक, पिछले चार वर्षों में किसी जिले में तीन साल या उससे अधिक समय तक तैनात रहे अधिकारियों को स्थानांतरित किया जाना है. अपने गृह जिले में तैनात चुनाव संबंधी अधिकारियों पर भी यह नियम लागू होगा.

निर्देशों के तहत संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को तबादलों की प्रक्रिया पूरी कराने और अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 30 नवंबर निर्धारित की गई है.

इस कदम का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया में प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखना और अधिकारियों की लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में तैनाती से पैदा होने वाली संभावित समस्याओं को रोकना है.

यूपी,उत्तराखंड,पंजाब,गोवा और मणिपुर पर आयोग का फोकस

निर्वाचन आयोग ने जिन पांच राज्यों के लिए निर्देश जारी किए हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल हैं. इन राज्यों में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं.चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले ही आयोग चुनावी तैयारियों की समीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में जुटा है.

इन राज्यों में चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की तैनाती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. आयोग की नीति के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को ऐसी स्थिति में एक ही जिले में लगातार बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए,जब वे निर्धारित कार्यकाल की सीमा पूरी कर चुके हों या अपने गृह जिले में तैनात हों.

निर्वाचन आयोग पहले भी विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले इस तरह के निर्देश जारी करता रहा है. इसका मकसद चुनावी व्यवस्था में निष्पक्षता सुनिश्चित करना और सभी राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों को समान अवसर उपलब्ध कराना है.

किन अधिकारियों का होगा तबादला?

तबादले की नीति मुख्य रूप से उन अधिकारियों पर लागू होती है, जिनकी चुनाव प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका होती है. इसमें जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ पुलिस और कुछ अन्य विभागों के अधिकारी भी शामिल हैं.

प्रमुख रूप से इन श्रेणियों के अधिकारियों की तैनाती की समीक्षा की जाएगी:

  • जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारी: चुनाव प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े अधिकारी।
  • पुलिस अधिकारी: कानून-व्यवस्था और चुनावी सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले संबंधित अधिकारी।
  • परिवहन विभाग: चुनाव के दौरान परिवहन व्यवस्था से जुड़े अधिकारी।
  • मद्यनिषेध एवं उत्पाद विभाग: चुनावी निगरानी और संबंधित प्रशासनिक कार्यों में भूमिका निभाने वाले अधिकारी।

हालांकि, तबादले का दायरा संबंधित निर्देशों और अधिकारी की चुनावी जिम्मेदारी के आधार पर तय होगा. इसका अर्थ यह नहीं है कि पांचों राज्यों के सभी सरकारी कर्मचारियों का तबादला किया जाएगा.

दो श्रेणियों के अधिकारियों पर लागू होगा नियम

निर्वाचन आयोग की नीति में मुख्य रूप से दो परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है.

पहली श्रेणी: एक जिले में तीन साल या उससे अधिक समय से तैनात अधिकारी.

यदि कोई अधिकारी पिछले चार वर्षों के दौरान एक ही जिले में तीन साल या उससे अधिक समय तक तैनात रहा है, तो उसकी तैनाती की समीक्षा की जाएगी. निर्धारित शर्तें पूरी होने पर उसे दूसरे जिले में स्थानांतरित किया जाएगा.

दूसरी श्रेणी: गृह जिले में तैनात अधिकारी.

जो अधिकारी अपने गृह जिले में तैनात हैं और चुनाव से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाते हैं, उन्हें भी आयोग की नीति के तहत दूसरी जगह भेजा जा सकता है.

निर्वाचन आयोग की स्थापित नीति के अनुसार, जिले में पदोन्नति के बाद उसी जिले में दूसरी जिम्मेदारी संभालने की अवधि की गणना भी निर्धारित नियमों के तहत की जा सकती है. इसका उद्देश्य केवल पद बदलकर एक ही जिले में लंबे समय तक बने रहने की स्थिति को रोकना है.

चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखना है मकसद

निर्वाचन आयोग के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना संवैधानिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है. चुनाव से संबंधित अधिकारियों की तैनाती इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि उन्हें मतदाता सूची, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और चुनावी नियमों के पालन जैसे कार्यों में जिम्मेदारी निभानी पड़ सकती है.

लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में तैनात अधिकारियों के स्थानीय प्रशासनिक और राजनीतिक लोगों से परिचित होने की संभावना रहती है. आयोग की तबादला नीति का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों से पैदा होने वाले संभावित पक्षपात या हितों के टकराव की आशंकाओं को कम करना है.

आयोग ने अपनी पिछली नीतियों में भी स्पष्ट किया है कि चुनाव से जुड़े अधिकारियों की तैनाती ऐसी होनी चाहिए, जिससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल न उठें. फरवरी 2024 में आयोग ने यह भी निर्देश दिया था कि निर्धारित शर्तों के तहत एक जिले से हटाए गए अधिकारियों को उसी संसदीय क्षेत्र के दूसरे जिले में तैनात करके नियमों की औपचारिक पूर्ति नहीं की जानी चाहिए.

30 नवंबर तक रिपोर्ट सौंपने की समयसीमा

संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को तबादलों से जुड़े निर्देशों का पालन कराने और 30 नवंबर तक अनुपालन रिपोर्ट जमा करने के लिए कहा गया है.

इस प्रक्रिया में राज्य सरकारों और संबंधित विभागों को पात्र अधिकारियों की सूची तैयार करनी होगी. इसके बाद लागू नियमों के अनुसार तबादलों से संबंधित प्रशासनिक आदेश जारी किए जाएंगे.

निर्धारित समयसीमा के भीतर रिपोर्ट जमा होने से आयोग को यह आकलन करने में मदद मिलेगी कि संबंधित राज्यों में निर्देशों का पालन किस हद तक किया गया है.

हालांकि, तबादलों की वास्तविक संख्या, प्रभावित अधिकारियों की सूची और अलग-अलग विभागों में आदेश लागू होने की स्थिति की जानकारी संबंधित सरकारी आदेशों से स्पष्ट होगी.

पहले भी चुनाव से पहले जारी होते रहे हैं ऐसे निर्देश

दरअसल हर चुनाव से पहले चुनाव आयोग की तरफ से मतदान वाले राज्यों में अधिकारियों की तैनाती को लेकर समीक्षा होती है औऱ लंब समय से जमे रहने वाले अधिकारियों के तबादले होते हैं.  इसका उद्देश्य लंबे समय से एक ही जिले में पदस्थ अधिकारियों और गृह जिले में तैनात चुनाव अधिकारियों को लेकर निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करना होता है.

आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों में भी स्पष्ट किया गया है कि चुनाव से संबंधित अधिकारियों की तैनाती और तबादले निष्पक्ष चुनाव कराने की व्यापक व्यवस्था का हिस्सा हैं.

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