‘ज्ञानेश कुमार के इस्तीफा देने तक चुनाव में हिस्सा लेने का कोई मतलब नहीं’: SIR विवाद के बीच CJP के अभिजीत दिपके

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दिपके Abhijeet Dipke ने सोमवार को आने वाले चुनावों पर शक जताया और कहा कि जब तक चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) ज्ञानेश कुमार ऑफिस में रहेंगे, तब तक चुनावों में हिस्सा लेना ‘बेकार’ होगा.
पत्रकारों से बात करते हुए, दीपके ने आरोप लगाया कि भाजपा उन राज्यों में जीत रही है जहां वह ‘मोदी लहर’ के चरम पर भी जीत हासिल करने में विफल रही.

ऐसे चुनावों में भाग लेने का कोई मतलब नहीं है- Abhijeet Dipke

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जब तक ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं करते, तब तक ऐसे चुनावों में भाग लेने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि विजेता पहले से ही पूर्व निर्धारित है.”
सीजेपी संस्थापक ने कहा, “बीजेपी उन राज्यों में जीत रही है जहां वह ‘मोदी लहर’ के चरम के दौरान एक भी जीत हासिल नहीं कर पाई थी – और यह ज्ञानेश कुमार के कारण हो रहा है. एक बार ज्ञानेश कुमार चले जाएं और एसआईआर फ्रीज हो जाए, तभी हमें पता चलेगा कि बीजेपी वास्तव में कितनी सीटें जीतती है.”


न्यूज़ एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, डिपके ने ये बातें पुणे में महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (MPSC) एग्जाम में कथित गड़बड़ियों को लेकर महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे स्टूडेंट्स के साथ एकजुटता दिखाने के लिए कहीं.

‘लड़ते रहेंगे…’: डिपके

शनिवार को, मुंबई के शिवाजी पार्क में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रोटेस्ट को लेकर डिपके के खिलाफ केस फाइल होने की खबरों के बीच, CJP फाउंडर ने X से कहा, “और केस फाइल करो लेकिन हम अपनी डेमोक्रेसी बचाने के लिए लड़ते रहेंगे.”
एक रेजिडेंट और एडवोकेट, सिद्धि देओलेकर ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने CJP के डिपके, आशुतोष रांका, सौरव दास और रत्ना सिंह के खिलाफ शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है, क्योंकि उन पर परमिशन न मिलने के बावजूद प्रोटेस्ट करने का आरोप है.

ECI और SIR का राजनीतिक झगड़ा

CJP के फाउंडर डिपके की यह टिप्पणी उस राजनीतिक बवाल के बीच आई है जो द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ था. रिपोर्ट में कहा गया था कि इलेक्शन कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वोटर रजिस्ट्रेशन, इलेक्टोरल रोल और टेक्नोलॉजी सिस्टम से जुड़े फैसलों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार ऑफिशियली आपत्ति जताई थी.

इस बीच, इलेक्शन कमीशन ने इस बात को खारिज कर दिया है कि बताई गई आपत्तियां आखिरी फैसलों पर इंस्टीट्यूशनल असहमति के बराबर हैं.

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