IIT कानपुर के पूर्व छात्रों का इनोवेशन, ‘आयरनलंग’ प्रदूषण से प्रभावित फेफड़ों में देगी मदद

ग्रेटर नोएडा । दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सुबह घर से निकलते ही ट्रैफिक का धुआं, सड़क किनारे उड़ती धूल और हवा में तैरते बारीक प्रदूषक कण आम नागरिकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। क्षेत्र में रोजाना सफर करने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण अब केवल मौसम की समस्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उनकी सांसों और स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगा है। प्रदूषित हवा के बीच लंबे समय तक रहने वाले लोगों के फेफड़ों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अब श्वसन मांसपेशियों (रेस्पिरेटरी मसल्स) की ट्रेनिंग के लिए एक स्वदेशी तकनीक विकसित की गई है।

'आयरनलंग' तकनीक और उसकी विशेषताएं

इस नवीन प्रणाली के तहत 'आयरनलंग' (IronLung) नामक उपकरण में सांस लेने के अभ्यास के लिए विशेष माउथपीस और सेंसर दिए गए हैं। इसके साथ ही 20 इंच की एक स्मार्ट स्क्रीन भी जोड़ी गई है, जिस पर उपयोगकर्ता अपने प्रशिक्षण और प्रदर्शन से जुड़ी सभी जानकारियों को लाइव देख सकते हैं। इस उपकरण में विभिन्न स्तरों के प्रशिक्षण मोड, रियल-टाइम परफॉर्मेंस ट्रैकिंग और यूजर के व्यक्तिगत प्रदर्शन के आधार पर कस्टमाइज्ड ट्रेनिंग प्रोग्राम उपलब्ध हैं। यह मशीन सांस लेने की क्षमता और सहनशक्ति (स्टैमिना) में आने वाले बदलावों को सटीक रूप से रिकॉर्ड करती है।

आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्रों की अनूठी पहल

इस श्वसन प्रशिक्षण प्रणाली 'आयरनलंग' को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के दो पूर्व छात्रों—परीक्षित और प्रियरंजन—द्वारा तैयार किया गया है, जिसे उन्होंने हाल ही में एक बड़े ट्रेड शो में प्रदर्शित किया। प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे आम नागरिकों को राहत देने के उद्देश्य से यह मशीन तैयार की गई है। इसके निर्माताओं ने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य अलग-अलग स्तर के प्रतिरोध (रेसिस्टेंस) के जरिए सांस लेने वाली मांसपेशियों को प्रशिक्षित करना है।

इस प्रक्रिया में प्रत्येक उपयोगकर्ता का एक डिजिटल कार्ड तैयार किया जाता है, जिसमें उनकी आयु, लिंग और स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य आवश्यक जानकारियां दर्ज रहती हैं। पिछले दो-तीन महीनों में इस तकनीक का उपयोग करने वाले लोगों के फेफड़ों की कार्यक्षमता और क्षमता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। पूरी तरह से स्वदेशी इस तकनीक का हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर भारत में ही विकसित किया गया है।

प्रदूषण के खिलाफ अगला कदम और उन्नत संस्करण

इस तकनीक को तैयार करने वाली टीम अब इस मशीन के अगले उन्नत संस्करण पर भी तेजी से काम कर रही है। परीक्षित ने जानकारी दी कि भविष्य के संस्करण में ऐसे रोगियों या व्यक्तियों के लिए सहायता विकसित की जा रही है, जो स्वयं से पर्याप्त रूप से सांस लेने का प्रयास नहीं कर पाते हैं। आगामी मशीन को सांस अंदर लेने (इन्हेल) और बाहर छोड़ने (एक्सहेल) में मरीजों की सहायता करने के उद्देश्य से डिजाइन किया जा रहा है।

दैनिक जीवन में दो से पांच मिनट का प्रशिक्षण

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस सिस्टम पर रोजाना केवल 2 से 5 मिनट तक ही एक्सरसाइज करनी होती है। यह मशीन अलग-अलग रेस्ट्रिक्शन के आधार पर फेफड़ों को सांस लेने का अभ्यास कराती है। सेंसर के माध्यम से व्यक्ति के प्रदर्शन को लगातार ट्रैक किया जाता है, जिससे समय के साथ होने वाले सुधारों का आकलन किया जा सके। यह स्वदेशी तकनीक विशेष रूप से उन लोगों के लिए बेहद मददगार साबित हो सकती है, जिन्हें चिकित्सकीय परामर्श के तहत श्वसन मांसपेशियों की विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है।

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