2007 में हुए सांसद सुनील महतो हत्याकांड में बड़ा खुलासा,हाईकमान के आदेश पर हुई थी हत्या..

Sunil Mahto murder case जमशेदपुर/रांची: झारखंड के पूर्व सांसद सुनील महतो हत्याकांड को लेकर माओवादी संगठन के पूर्व कमांडर रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन ने पुलिस की पूछताछ में कई अहम खुलासे किये हैं.सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले सचिन ने बताया कि वर्ष 2007 में जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की हत्या माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर की गई थी. उसके मुताबिक, इस वारदात का फैसला किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने लिया था.

सचिन ने पूछताछ में हत्याकांड में शामिल अन्य माओवादियों, संगठन के कामकाज, हथियारों की व्यवस्था और लेवी से जुटाए जाने वाले पैसों के इस्तेमाल के बारे में भी जानकारी दी है. उसने दावा किया कि सांसद पर गोली चलाने वालों में रंजीत पाल उर्फ राहुल समेत कई अन्य माओवादी शामिल थे. हालांकि, सचिन के इस बयान और इसमें किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच एजेंसियों के स्तर पर की जानी बाकी है.

Sunil Mahto murder case :4 मार्च 2007 को हुई थी सांसद सुनील महतो की ह’त्या

जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की 4 मार्च 2007 को पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला क्षेत्र के बाघुड़िया में एक फुटबॉल मैच के दौरान गोली मारकर ह’त्या कर दी गई थी. इस हमले में सांसद के अलावा अन्य लोग भी मारे गए थे. इस घटना ने झारखंड में माओवादी हिंसा और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे.

इस मामले में रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन का नाम लंबे समय से सामने आता रहा है. पटमदा के झुंझका गांव का रहने वाला सचिन प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में सक्रिय था. वह संगठन में जोनल कमांडर और क्षेत्रीय स्तर के पदों पर काम कर चुका है.

पुलिस पूछताछ में सचिन ने बताया कि हत्याकांड के समय वह संगठन में करीब एक साल से ही सक्रिय था. उसके अनुसार, इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देने का निर्णय संगठन के शीर्ष स्तर पर लिया गया था.

सचिन के बयान के मुताबिक, सुनील महतो हत्याकांड में करीब दर्जनभर या उससे अधिक माओवादी शामिल थे. उसने कहा कि संगठन में बड़ी वारदातों को अंजाम देने का निर्णय पोलित ब्यूरो मेंबर (PBM) और सेंट्रल कमेटी मेंबर (CCM) जैसे वरिष्ठ पदाधिकारियों के स्तर पर लिया जाता था.

उसने पूछताछ में यह भी बताया कि वह सांसद की हत्या में शामिल था, लेकिन उसने खुद सुनील महतो पर गोली नहीं चलाई थी. उसके अनुसार, रंजीत पाल उर्फ राहुल समेत दूसरे माओवादियों ने सांसद पर गोलियां चलाई थीं. वारदात को अंजाम देने में कई दस्तों के सदस्यों की भूमिका थी.

हत्या के बाद लालगढ़ पहुंचा था सचिन, किशनजी के साथ बिताए चार साल

सांसद सुनील महतो की हत्या के बाद सचिन पश्चिम बंगाल के लालगढ़ क्षेत्र में चला गया था. उसके मुताबिक, लालगढ़ आंदोलन के दौरान वह करीब चार साल तक माओवादी नेता किशनजी के साथ रहा.

किशनजी माओवादी संगठन के प्रमुख नेताओं में शामिल था और पश्चिम बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र में संगठन की गतिविधियों में उसकी अहम भूमिका रही थी. किशनजी की मौत के बाद सचिन फिर झारखंड लौट आया.

इसके बाद उसने झारखंड के कई इलाकों में संगठन के लिए काम किया. इनमें पटमदा, एमजीएम, गालूडीह और घाटशिला जैसे क्षेत्र शामिल थे. वह सारंडा के जंगलों में भी सक्रिय रहा और बाद में दलमा क्षेत्र में लौट आया.

सचिन के अनुसार, उसका मुख्य कार्यक्षेत्र पश्चिम बंगाल रहा, लेकिन संगठन के निर्देश पर उसने झारखंड के सारंडा, खूंटी और दलमा जैसे इलाकों में भी गतिविधियां संचालित कीं.

पुलिस से हथियार लूटते थे,गोलियां खरीदने के लिए खर्चते थे लेवी की रकम..

पूछताछ में सचिन ने माओवादी संगठन के आर्थिक और हथियार संबंधी इंतजामों के बारे में भी जानकारी दी. उसके मुताबिक, संगठन को उस समय लेवी के जरिए अच्छी-खासी रकम मिलती थी. इस पैसे का इस्तेमाल हथियारों के रखरखाव, गोलियां खरीदने, वर्दी, कपड़े और दवाइयों की व्यवस्था में किया जाता था.

सचिन ने बताया कि संगठन के सदस्य कई बार पुलिस जवानों से हथियार लूटकर अपने पास रखते थे लेकिन हथियार मिलने के बावजूद उनके लिए गोलियों की व्यवस्था अलग से करनी पड़ती थी. इसके लिए संगठन की आर्थिक मदद और लेवी से जुटाए गए धन का इस्तेमाल किया जाता था.

उसके बयान के अनुसार, माओवादी संगठन के लिए हथियार जुटाना और उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल के लायक बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी. हथियारों की उपलब्धता के साथ-साथ गोला-बारूद और दूसरी जरूरी सामग्री का इंतजाम भी संगठन के संचालन का अहम हिस्सा था.

एक गोली खरीदने में खर्च होते थे करीब 500 रुपये

सचिन ने पूछताछ में दावा किया कि माओवादी संगठन को एक गोली खरीदने के लिए करीब 500 रुपये तक खर्च करने पड़ते थे. उसके मुताबिक, लेवी से मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा गोला-बारूद की खरीद में चला जाता था.

इसके अलावा संगठन के सदस्यों की वर्दी, कपड़े और दवाइयों पर भी पैसे खर्च किए जाते थे. सचिन ने कहा कि उसने संगठन के लिए जुटाई गई रकम में से कभी एक पैसा भी अपने परिवार को नहीं भेजा.

उसके इस बयान से संगठन के वित्तीय प्रबंधन और हथियारों के लिए होने वाले खर्च का एक पहलू सामने आता है. हालांकि, गोली की कीमत और संगठन के कुल खर्च से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है.

पाइप में छिपाकर जमीन के नीचे दबाते थे हथियार

सचिन ने हथियारों को छिपाने के तरीके के बारे में भी पुलिस को जानकारी दी. उसके मुताबिक, संगठन में हथियारों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी मंगल और मालती नाम के सदस्यों को सौंपी गई थी.

उसने बताया कि हथियारों को पानी के पटवन में इस्तेमाल होने वाले डिलीवरी पाइप के भीतर रखकर जमीन में दबा दिया जाता था. सचिन के दावे के अनुसार, इस तरीके से हथियारों को करीब दो साल तक सुरक्षित रखा जा सकता था.

जंगलों और दुर्गम इलाकों में सक्रिय माओवादी दस्तों के लिए हथियारों को छिपाकर रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निकालना संगठन की गतिविधियों का अहम हिस्सा था.

अनीता के सरेंडर के बाद संगठन से दूरी बनाने का दावा

सचिन ने पूछताछ के दौरान संगठन छोड़ने की अपनी प्रक्रिया के बारे में भी बताया. उसके अनुसार, अनीता के माओवादी संगठन से अलग होकर पश्चिम बंगाल में आत्मसमर्पण करने के बाद उसने भी संगठन के भीतर अपनी गतिविधियां सीमित कर दी थीं.

उसने दावा किया कि 15 अगस्त से पहले ही वह असीम मंडल उर्फ आकाश से भी अलग हो गया था. असीम मंडल माओवादी संगठन का एक प्रमुख नेता रहा है.

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