ISRO Privatization नई दिल्ली: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन( ISRO) के कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ने लगी है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले 9 कर्मचारी संगठनों ने ISRO के चेयरमैन वी. नारायणन को पत्र लिखकर एजेंसी के कामकाज में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है.
STORY | ISRO staff bodies seek clarification on trajectory of privatisation
Nine employee associations at the Indian Space Research Organisation (ISRO) have written to the space agency’s Chairperson V Narayanan, seeking official clarification on the proposed transfer of its… pic.twitter.com/hNkIPacn1z
— Press Trust of India (@PTI_News) September 6, 2026
कर्मचारी संगठनों ने खास तौर पर लॉन्च व्हीकल के निर्माण और संचालन, सैटेलाइट निर्माण तथा ISRO की भविष्य की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं. संगठनों का कहना है कि निजी क्षेत्र को काम सौंपने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों के बीच कर्मचारियों को सरकार की नीति, उसके कानूनी एवं प्रशासनिक आधार और इसके संभावित असर की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए.
ISRO Privatization की चर्चा क्यों तेज हुई?
यह पूरा विवाद स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की नीति के बीच सामने आया है. कर्मचारी संगठनों की चिंता उस समय और बढ़ी जब IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका की ओर से लॉन्च व्हीकल के निर्माण को लेकर दिए गए बयान की चर्चा हुई;
रिपोर्ट के मुताबिक, गोयनका ने एक कार्यक्रम में कहा था कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के जरिए कराया जाएगा. उन्होंने कहा था कि इस बदलाव की शुरुआत SSLV से हो चुकी है और आगे इसे PSLV और LVM3 तक भी बढ़ाया जा सकता है.
इन टिप्पणियों के बाद ISRO के विभिन्न केंद्रों के कर्मचारी संगठनों ने अपनी चिंताएं सामने रखीं.
9 कर्मचारी संगठनों ने लिखी चिट्ठी
ISRO के अलग-अलग केंद्रों से जुड़े 9 संगठनों ने चेयरमैन वी. नारायणन को पत्र भेजा है। इनमें ISRO Staff Association,SHAR Employees Association, ISAC Employees Association, ISRO Staff Association-LPSC, ISRO Staff Association-BBU, NRSA Employees Union, Space Employees Association-BBU, ISRO Staff Association-IPRC और SAC Employees Welfare Association शामिल हैं.
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर निजी क्षेत्र को लेकर सामने आ रहे बयानों के बावजूद विभाग की ओर से कर्मचारियों को प्रस्तावित नीति की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.
उनका सवाल है कि यदि ISRO के मौजूदा कामों को निजी कंपनियों और PSU को हस्तांतरित किया जाता है तो इसका वर्तमान कर्मचारियों, भविष्य की भर्तियों और संगठन की भूमिका पर क्या असर पड़ेगा.
‘कर्मचारियों को आधिकारिक नीति की जानकारी नहीं’
कर्मचारी संगठनों ने पत्र में कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर सामने आए बयानों को लेकर काफी चर्चा हुई है, लेकिन Department of Space की ओर से कर्मचारियों को प्रस्तावित नीति और उसके कानूनी एवं प्रशासनिक आधार के बारे में पर्याप्त आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.
संगठनों ने यह भी जानना चाहा है कि इस बदलाव को लागू करने के लिए मौजूदा वर्कफोर्स को लेकर क्या योजना है और भविष्य में सरकारी स्तर पर ISRO में भर्ती का क्या स्वरूप होगा.
यानी कर्मचारियों की चिंता केवल नौकरी की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. वे यह भी जानना चाहते हैं कि आने वाले वर्षों में ISRO खुद क्या करेगा और निजी क्षेत्र को कौन-कौन से काम सौंपे जाएंगे.
लॉन्च व्हीकल का काम सिर्फ ‘मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट’ नहीं
कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में लॉन्च व्हीकल से जुड़े कामों की अहमियत पर विशेष जोर दिया है.
उनका तर्क है कि रॉकेट का डिजाइन, निर्माण, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और लॉन्च ऑपरेशन को केवल सामान्य ‘मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट’ के तौर पर नहीं देखा जा सकता. ये ISRO की मुख्य तकनीकी क्षमता, संस्थागत अनुभव और रणनीतिक क्षमता का हिस्सा हैं.
संगठनों का मानना है कि इन गतिविधियों को बड़े पैमाने पर बाहरी एजेंसियों को सौंपने से ISRO की संस्थागत विशेषज्ञता और लंबे समय से विकसित तकनीकी ज्ञान पर असर पड़ सकता है.
करीब 120 तकनीकों के ट्रांसफर का भी जिक्र
कर्मचारी संगठनों ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए उन करीब 120 तकनीकों का भी उल्लेख किया है, जिन्हें ISRO की ओर से निजी क्षेत्र को ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है.
स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार करना, निजी निवेश को आकर्षित करना और लॉन्च तथा सैटेलाइट सेवाओं की क्षमता बढ़ाना है. हालांकि, ISRO के कर्मचारियों के संगठन चाहते हैं कि इस बदलाव के साथ सरकारी अंतरिक्ष एजेंसी की मूल जिम्मेदारियों और उसके मानव संसाधन की भूमिका भी स्पष्ट की जाए.
ISRO की भूमिका पर उठ रहे हैं सवाल
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रह गया है. सरकार ने निजी कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर के दरवाजे खोले हैं और IN-SPACe जैसी व्यवस्था के जरिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है.
ऐसे में ISRO के सामने आने वाले समय में रिसर्च, नई तकनीकों के विकास, मिशन डिजाइन और अत्याधुनिक अंतरिक्ष अभियानों पर ज्यादा ध्यान देने की भूमिका बन सकती है, जबकि कुछ नियमित निर्माण और परिचालन गतिविधियां निजी कंपनियों या PSU को दी जा सकती हैं.
लेकिन कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि इस बदलाव को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ हो. उनका जोर इस बात पर है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना और ISRO की मूल तकनीकी क्षमता को बनाए रखना—दोनों के बीच संतुलन स्पष्ट होना चाहिए.
क्या ISRO का होगा निजीकरण?
फिलहाल इसके बारे में मोदी सरकार की तरफ से कोई जानकरी नहीं दी गई है , कर्मचारियों के बीच ये जानकारी मीडिया में आ रही खबरों के आधार पर ही फैली है. कर्मचारियों की ओर से उठाया गया मुद्दा मुख्य रूप से एजेंसी के कुछ निर्माण और परिचालन कार्यों को निजी क्षेत्र या PSU को सौंपे जाने की संभावित दिशा को लेकर है.
इसलिए मौजूदा स्थिति को ISRO के कर्मचारियों की नीति और संगठन के भविष्य को लेकर चिंता के रूप में देखा जा रहा है.कर्मचारियों की नजर ISRO चेयरमैन और Department of Space की ओर से मिलने वाले आधिकारिक स्पष्टीकरण पर हैय
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के तेजी से विस्तार के बीच यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर सरकार निजी क्षेत्र की क्षमता का इस्तेमाल कर भारत को वैश्विक स्पेस पावर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है, वहीं दूसरी ओर ISRO की दशकों में विकसित तकनीकी विशेषज्ञता और रणनीतिक क्षमताओं को सुरक्षित रखना भी उतना ही अहम है.

