SIR Muslim Voters नई दिल्ली : चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है. मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्षी दलों ने महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक, झारखंड और पश्चिम बंगाल के आंकड़ों पर गंभीर सवाल उठाए हैं. इसी बीच द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में झारखंड के गोड्डा में कथित तौर पर कुछ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश का मामला सामने आने के बाद विवाद और बढ़ गया है.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ बूथों पर बीजेपी के बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने Form 7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की. हालांकि, कम से कम चार बूथों पर बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) ने इन आवेदनों को स्वीकार नहीं किया. विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में खास तौर पर मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाने की कोशिश की गई.
हालांकि, इन आरोपों और रिपोर्ट में किए गए दावों पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित चुनाव अधिकारियों की जांच और आधिकारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है.
SIR Muslim Voters: गोड्डा में Form 7 को लेकर विवाद
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड के गोड्डा में एक बीजेपी बूथ लेवल एजेंट कथित तौर पर Form 7 लेकर BLO के पास पहुंचा और ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल कुछ लोगों के नाम हटाने की मांग की.
Form 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए किया जाता है. इसके जरिए मतदाता की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने या किसी अन्य वैध आधार का हवाला देकर नाम हटाने का अनुरोध किया जा सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ BLOs को इन आवेदनों की सत्यता और प्रक्रिया को लेकर आपत्ति थी. कम से कम चार बूथों पर अधिकारियों ने कथित तौर पर ऐसे आवेदन लेने से इनकार कर दिया.
यही मामला अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है.
विपक्ष का दावा- मुस्लिम वोटरों को बनाया गया निशाना
विपक्षी दलों का आरोप है कि गोड्डा में जिन मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी.
रिपोर्ट में जिन लोगों का उल्लेख किया गया है, उनके बारे में दावा है कि वे लंबे समय से, बल्कि पीढ़ियों से संबंधित गांवों में रह रहे हैं. इनमें से कई मतदाताओं का 2003 के मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान सत्यापन भी हो चुका था.
विपक्ष का तर्क है कि ऐसे मतदाताओं के लिए SIR प्रक्रिया के दौरान अपनी पात्रता साबित करना अपेक्षाकृत आसान होना चाहिए. इसलिए यदि ऐसे लोगों के नाम हटाने की कोशिश की गई है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी मतदाता के नाम पर Form 7 दाखिल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसका नाम अंतिम रूप से वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है. नाम हटाने से पहले चुनावी प्रक्रिया के तहत सत्यापन और आपत्ति की व्यवस्था होती है.
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल
झारखंड के मामले को लेकर राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
सिब्बल का कहना है कि कोई भी बूथ स्तर का कार्यकर्ता यह दावा कर सकता है कि कोई व्यक्ति संबंधित पते पर नहीं रहता और उसका नाम मतदाता सूची से हटाया जाना चाहिए. इसके बाद Form 7 के जरिए प्रक्रिया शुरू हो सकती है.
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि BLO को आवेदन संदिग्ध लगा और उसने उसे लेने से इनकार किया, तो ऐसे मामलों में आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए.
सिब्बल ने आरोप लगाया कि यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी खास समुदाय के मतदाताओं को निशाना बनाया गया, तो यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा.
उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और SIR की मंशा पर भी राजनीतिक सवाल उठाए और आरोप लगाया कि प्रक्रिया का इस्तेमाल बीजेपी के पक्ष में वोटरों की सूची को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है.
इन आरोपों पर चुनाव आयोग की ओर से संबंधित मामले में क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, यह इस विवाद में महत्वपूर्ण होगा.
राहुल गांधी का हमला- ‘वोट चोरी’ का आरोप
SIR को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी लगातार चुनाव आयोग और बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं.
उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव का इस्तेमाल चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है.
राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के 2024 लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया. उन्होंने पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए नामों में से बड़ी संख्या में अपील के बाद नाम वापस जोड़े जाने का भी उल्लेख किया.
उन्होंने महाराष्ट्र के SIR ड्राफ्ट रोल में बड़ी संख्या में मतदाताओं के शामिल नहीं होने को भी सवालों के घेरे में रखा.
कांग्रेस नेता ने इसे ‘वोट चोरी’ करार देते हुए आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव के जरिए बीजेपी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है.
महाराष्ट्र में 2 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं
महाराष्ट्र में SIR को लेकर सामने आए आंकड़ों ने भी राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है.
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी के अनुसार, SIR प्रक्रिया के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में 2.06 करोड़ से ज्यादा मतदाता शामिल नहीं हैं. यह पिछली मतदाता सूची के करीब 21.14 प्रतिशत मतदाताओं के बराबर है.
ड्राफ्ट रोल में करीब 7.71 करोड़ मतदाता शामिल हैं, जो पिछले वोटर बेस का लगभग 78.86 प्रतिशत है.
चुनाव अधिकारियों के मुताबिक बड़ी संख्या में लोगों के Enumeration Forms प्राप्त नहीं हो सके. इसके पीछे मतदाताओं का नहीं मिलना, मृत्यु या स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाना जैसे कारण बताए गए हैं.
यानी चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक ड्राफ्ट सूची से नाम हटने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि संबंधित व्यक्ति को स्थायी तौर पर मतदान के अधिकार से बाहर कर दिया गया है. दावा-आपत्ति और सुधार की प्रक्रिया इसके बाद भी जारी रहती है.
दिल्ली में भी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर सवाल
दिल्ली में SIR के तहत जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची ने भी राजनीतिक विवाद पैदा कर दिया है.
दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ के पिछले वोटर बेस में से 47 लाख से अधिक नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं दिखाई दिए.
अधिकारियों के मुताबिक इनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की है जो या तो अपने पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह चले गए. इसके अलावा करीब 2.82 लाख मतदाताओं को मृत और लगभग 1.41 लाख को एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत पाया गया.
दिल्ली में ड्राफ्ट स्तर पर करीब 33 प्रतिशत नाम हटने का आंकड़ा सामने आने के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग से सवाल पूछे हैं.
हालांकि, चुनाव आयोग की प्रक्रिया में ड्राफ्ट सूची अंतिम मतदाता सूची नहीं होती. जिन मतदाताओं के नाम छूटे हैं, उन्हें दावे और आपत्तियां दर्ज करने का अवसर दिया जाता है.
अरविंद केजरीवाल का तंज
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा.
केजरीवाल ने दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में लाखों नाम नहीं होने पर सवाल उठाते हुए व्यंग्य किया कि यदि इसी तरह मतदाता सूची से नाम हटते रहे तो देश की आबादी और मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर पैदा हो जाएगा.
उनका आरोप है कि SIR के जरिए बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में भी SIR बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद पहले से ही जारी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग पर आरोप लगाती रही है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया गया.
ममता बनर्जी ने हाल में आरोप लगाया कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में नाम हटाकर विधानसभा चुनाव को प्रभावित किया गया.
पश्चिम बंगाल में करीब 36.6 लाख मामलों का निपटारा अभी लंबित होने की बात सामने आई है. इन मामलों से जुड़े विवाद अपीलेट ट्रिब्यूनल के स्तर पर लंबित हैं.
मुस्लिम समुदाय के नेताओं की ओर से भी इस प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई गई है. हाल में टीएमसी के बागी नेता और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर अपीलेट ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों के जल्द निपटारे की मांग की थी.
कर्नाटक में डीके शिवकुमार ने CEC को लिखा पत्र
कर्नाटक भी SIR को लेकर विपक्षी सवालों के केंद्र में है.
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान पर्याप्त समय और निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की मांग की है.
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने भी शिवकुमार के पत्र को सार्वजनिक किया.
शिवकुमार के मुताबिक कर्नाटक में 1.08 करोड़ से अधिक मतदाताओं को ASDDO के तौर पर चिह्नित किया गया है. इसके अलावा करीब 43 लाख मतदाताओं को लॉजिकल गड़बड़ियों के संबंध में नोटिस भेजे जाने की बात कही गई है.
कर्नाटक सरकार ने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए पर्याप्त समय देने की भी मांग की है.
SIR है क्या?
Special Intensive Revision यानी SIR चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है.
इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और ऐसे नामों की पहचान करना है जो अब पात्र नहीं हैं. इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोग, एक से अधिक जगह पंजीकृत मतदाता और अन्य अपात्र प्रविष्टियां शामिल हो सकती हैं.
लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची से गायब हो जाता है.
यही वजह है कि SIR के दौरान Enumeration Form, BLO verification, claims and objections तथा appeal जैसी प्रक्रियाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं.
चुनाव आयोग क्या कहता है?
चुनाव आयोग लगातार यह रुख रखता रहा है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण लोकतांत्रिक चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है.
आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची में मृत लोगों, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों और डुप्लीकेट नामों का बने रहना भी चुनाव प्रक्रिया के लिए समस्या है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने हाल में भारत की चुनाव प्रक्रिया में दुनिया की रुचि का उल्लेख करते हुए कहा था कि कई देश भारत की चुनाव प्रणाली और चुनाव आयोग के कामकाज को समझने में रुचि रखते हैं.
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भी SIR को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की गई थी.
विवाद का असली सवाल क्या है?
SIR को लेकर इस समय दो अलग-अलग दावे आमने-सामने हैं.
चुनाव आयोग और उसके समर्थकों का तर्क है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी है और ड्राफ्ट सूची में नाम हटना अंतिम कार्रवाई नहीं है. वास्तविक मतदाताओं को दावा और आपत्ति के जरिए अपना नाम वापस जुड़वाने का अवसर मिलता है.
वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में ऐसे मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हो सकते हैं जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं. विपक्ष खास तौर पर मुस्लिम, गरीब और प्रवासी मतदाताओं के नामों को लेकर आशंकाएं जता रहा है.
इसलिए आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि कितने नाम हटे, कितने नामों पर आपत्तियां आईं और उनमें से कितने नाम जांच के बाद दोबारा मतदाता सूची में जोड़े गए.
2027 और 2026 के चुनावों से पहले बढ़ी राजनीतिक अहमियत
SIR का विवाद ऐसे समय में तेज हुआ है जब देश में कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही है।
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की बुनियादी जरूरत होती है. ऐसे में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाता है.
विपक्ष जहां SIR में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग कर रहा है, वहीं चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को साफ-सुथरा और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखता है.

