डेंगू के खिलाफ वैज्ञानिकों की अनोखी रणनीति, ब्राजील में 70% तक कम हुए मामले

बेलेम: दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील का बेलेम शहर महज दो साल पहले तक डेंगू के भयंकर प्रकोप से बुरी तरह जूझ रहा था। स्थिति यह थी कि अस्पताल मरीजों से पूरी तरह भर जाते थे और मच्छरों को समाप्त करने के लिए अत्यधिक मात्रा में रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव से पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा था। ऐसे संकट के समय इस शहर ने मच्छरों से मुकाबला करने के लिए एक ऐसा नायाब और अनूठा रास्ता चुना, जिसने पूरी तस्वीर ही बदल दी। इस सरल और प्रभावी तकनीक के इस्तेमाल से बेलेम में डेंगू और अन्य मच्छरजनित बीमारियों के संक्रमण पर करीब 70 प्रतिशत तक नियंत्रण पा लिया गया है।

आज ब्राजील का यह प्रमुख शहर डेंगू के खिलाफ छेड़ी गई जंग में दुनिया भर के तमाम देशों के लिए एक अनुकरणीय मिसाल बन चुका है। बेलेम प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर एक बेहद सरल किंतु क्रांतिकारी तरीका अपनाया, जिसके तहत विशेष 'लार्विसाइड युक्त बाल्टियों' का उपयोग किया जाता है। छोटे आकार के कूड़ेदान जैसी दिखने वाली ये बाल्टियां मादा मच्छरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बिल्कुल अनुकूल, अंधेरी और नम जगह प्रदान करती हैं।

इन विशेष बाल्टियों के भीतर लार्विसाइड रसायन से सुसज्जित एक जालीदार पट्टी लगाई जाती है। जब कोई मादा मच्छर अंडे देने के लिए वहां बैठती है, तो वह रसायन उसके शरीर से चिपक जाता है। इसके बाद जब वह मच्छर उड़कर अन्य प्राकृतिक प्रजनन स्थलों पर जाता है, तो वह उस रसायन को अपने साथ वहां भी ले जाता है। इस अनोखी प्रक्रिया के प्रभाव से उन अन्य जगहों पर पनप रहे मच्छरों के लार्वा भी स्वतः नष्ट हो जाते हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी 'मच्छर फैक्टरी' का नवाचार

इस गंभीर स्वास्थ्य संकट से उबरने के लिए ब्राजील ने पारंपरिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक जहरीले कीटनाशकों के अंधाधुंध छिड़काव से तौबा करते हुए पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) तकनीकों का रुख किया। इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पिछले वर्ष देश में दुनिया की सबसे बड़ी 'मच्छर फैक्टरी' की स्थापना की गई।

यह विशेष बायो-उत्पादन केंद्र बेलेम शहर से कुछ ही मील की दूरी पर स्थित कुरितिबा में बनाया गया है। इस आधुनिक केंद्र में 'वोल्बाचिया' (Wolbachia) नामक एक विशेष प्राकृतिक बैक्टीरिया से युक्त मच्छरों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है, जिन्हें बाद में सुनियोजित तरीके से मच्छरजनित बीमारियों से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में छोड़ा जाता है।

मच्छरों की आबादी और वायरस को रोकने में मददगार

वैज्ञानिकों के अनुसार, वोल्बाचिया एक पूरी तरह सुरक्षित बैक्टीरिया है, जो प्रकृति रूप से दुनिया के लगभग आधे कीटों में सामान्य रूप से पाया जाता है; हालांकि, यह आमतौर पर डेंगू, जीका और चिकनगुनिया जैसी खतरनाक बीमारियां फैलाने वाले 'एडीज एजिप्टी' मच्छरों के भीतर नहीं होता है।

जब प्रयोगशाला में तैयार किए गए इन वोल्बाचिया-युक्त मच्छरों को प्रभावित बस्तियों में छोड़ा जाता है, तो वे खुले में मौजूद जंगली मच्छरों के साथ सह-प्रजनन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप या तो उन खतरनाक मच्छरों की आबादी तेजी से नियंत्रित हो जाती है या फिर उनकी आने वाली नई पीढ़ियों के भीतर डेंगू के वायरस को इंसानों तक पहुंचाने की क्षमता पूरी तरह से समाप्त हो जाती है।

सामूहिक प्रयासों से बदली तस्वीर, वापस लौटीं दुर्लभ तितलियां

बेलेम शहर के मेयर इगोर नोर्मांदो का कहना है कि शहर को इस बड़ी बीमारी से मुक्ति दिलाने में सामूहिक प्रयासों की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इसके तहत स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित रूप से घर-घर जाकर निरीक्षण किया जाता है और नागरिकों को अपने आसपास पानी जमा न होने देने के लिए लगातार जागरूक किया जाता है।

रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव को अब बेहद सीमित कर दिया गया है, जिसका एक और सकारात्मक परिणाम यह देखने को मिला है कि कभी केमिकल के दुष्प्रभावों के कारण इस क्षेत्र से लुप्त हो चुकीं दुर्लभ प्रजाति की तितलियां भी अब दोबारा वापस लौट आई हैं और महानगर में नजर आने लगी हैं।

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