नई दिल्ली। रूस से कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत पर संभावित भारी-भरकम अमेरिकी शुल्क (टैरिफ) के खतरे के बीच अमेरिका की तरफ से एक सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन के एक शीर्ष अधिकारी ने यह स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच के मजबूत संबंध इस व्यापारिक पेچतिगी को सुलझाने में पूरी तरह सक्षम हैं।
द्विदलीय विधेयक से गर्माया माहौल
यह पूरा कूटनीतिक और आर्थिक विवाद अमेरिकी सीनेट में हाल ही में पारित हुए एक नए विधेयक के बाद चर्चा के केंद्र में आया है। अमेरिकी सीनेट ने भारी बहुमत के साथ एक ऐसा प्रस्ताव मंजूर किया है, जिसके तहत राष्ट्रपति को रूस और ईरान से ऊर्जा उत्पादों का आयात करने वाले देशों के खिलाफ सख्त आर्थिक कदम उठाने का अधिकार मिल जाएगा। इस प्रावधान के दायरे में रूस से तेल एवं गैस खरीदने वाले प्रमुख देश आ सकते हैं, जिसके चलते वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।
ऊर्जा सुरक्षा और भारत की स्थिति
रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े संघर्ष के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में आई भारी अस्थिरता के दौर में भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए किफायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात किया था। रियायती कीमतों पर मिलने वाले इस तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को उत्पादन लागत नियंत्रित रखने और देश की ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। नए अमेरिकी प्रस्ताव के अमल में आने पर ऊर्जा आयातक देशों के सामने रियायती ईंधन और अमेरिकी बाजार के बीच किसी एक विकल्प को चुनने की स्थिति बन सकती है।
कूटनीतिक संवाद से हल होने की उम्मीद
इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार पीटर नवारो ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आपसी संबंध बेहद प्रगाढ़ और बेहतरीन हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों देशों के नेता आपसी बातचीत के जरिए इस मुद्दे का एक ऐसा व्यावहारिक समाधान निकाल लेंगे, जिससे किसी भी प्रकार के गतिरोध की गुंजाइश नहीं बचेगी।

