Tarun Tejpal convicted : बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल Tarun Tejpal को बरी करने के फैसले को पलट दिया.
बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने पूर्व पत्रकार को 2013 में गोवा के एक होटल में अपनी एक सहकर्मी के साथ रेप करने का दोषी पाया था. यह सज़ा 2021 में गोवा सेशंस कोर्ट द्वारा तेजपाल को बरी किए जाने के बाद हुई है.
Tarun Tejpal convicted : 2013 में महिला सहकर्मी ने लगाए थे तेजपाल पर आरोप
तेजपाल को 2013 में एक महिला पत्रकार द्वारा होटल की लिफ्ट के अंदर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के बाद गिरफ्तार किया गया था. 2017 में, तहलका के पूर्व एडिटर पर इंडियन पीनल कोड (IPC) की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे, जिनमें रेप, यौन उत्पीड़न और गलत तरीके से कैद करना शामिल था. हालांकि, तेजपाल ने खुद को बेगुनाह बताया था. ये शिकायत 18 नवंबर 2013 को पीड़िता ने तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी से की थी. इसके अगले दिन तरुण तेजपाल ने पीड़िता को ईमेल भेजकर “निर्णय की शर्मनाक भूल” के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी. उन्होंने स्वीकार किया था कि उन्होंने पीड़िता की स्पष्ट अनिच्छा के बावजूद उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की.
बाद में गोवा पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया और 30 नवंबर 2013 को तरुण तेजपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई 2014 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से नियमित जमानत मिली थी.
आरोप रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट भी गए थे Tarun Tejpal
इसके बाद पत्रकार ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसमें कहा गया कि उन्हें फंसाया गया था.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया और ट्रायल को छह महीने के अंदर खत्म करने का निर्देश दिया.
गोवा कोर्ट ने 2021 में Tarun Tejpal को किया था आरोपों से बरी
मई 2021 में, गोवा सेशन कोर्ट ने तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया, यह कहते हुए कि प्रॉसिक्यूशन बिना किसी शक के अपना केस साबित करने में नाकाम रहा है.
ट्रायल कोर्ट ने मेडिकल सबूतों की कमी पर भी ध्यान दिया और शिकायत करने वाली और तेजपाल के बीच हुए मैसेज पर भरोसा किया, जो प्रॉसिक्यूशन के इस दावे को सपोर्ट नहीं करते थे कि महिला कथित हमले से सदमे में थी.
सजा पर दोपहर में होगी सुनवाई
दोषसिद्धि के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने अदालत से सजा में नरमी बरतने की मांग की. उन्होंने कहा कि कथित घटना को लगभग 13 वर्ष हो चुके हैं और तेजपाल के खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला दर्ज नहीं है. साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने के लिए दोषसिद्धि पर आठ सप्ताह की रोक लगाने की भी मांग की.
सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद 62 वर्षीय तरुण तेजपाल ने भी खुद को पीड़ित बताते हुए कहा कि उनकी उम्र और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए अदालत नरमी बरते.
राज्य सरकार ने कहा- ‘No Means No’ का संदेश देना जरूरी
गोवा सरकार की ओर से पेश भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सजा में किसी भी तरह की नरमी का विरोध किया. उन्होंने कहा कि पीड़िता आरोपी की बेटी की उम्र की थी और आरोपी उसके लिए एक अभिभावक जैसी भूमिका में था.
मेहता ने अदालत से कहा कि समाज को स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि “जब कोई महिला ‘ना’ कहती है, तो उसका अर्थ ‘ना’ ही होता है.”
2021 में सत्र अदालत ने किया था बरी
मई 2021 में मापुसा की विशेष अदालत ने यह कहते हुए तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष आरोपों के समर्थन में पर्याप्त पुष्टिकरण (Corroborative Evidence) पेश नहीं कर पाया और पीड़िता के बयान में विरोधाभास पाए गए. इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सत्र अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच करने के बजाय पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि पर अधिक ध्यान दिया. सरकार ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने तरुण तेजपाल द्वारा भेजे गए मांफी वाले ईमेल समेत कई महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की अनदेखी की.
हाईकोर्ट ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और तरुण तेजपाल को दोषी ठहराया. हाईकोर्ट ने फिलहाल केवल दोषसिद्धि का फैसला सुनाया है. अब अदालत अलग से सजा पर सुनवाई करेगी. वहीं, बचाव पक्ष ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा.

