वाराणसी। इस बार सावन माह की अमावस्या पर वर्ष का आखिरी सूर्य ग्रहण का योग बन रहा है। यह एक अत्यंत दुर्लभ खग्रास (पूर्ण) सूर्य ग्रहण होगा। चूंकि सनातन परंपरा में सावन अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है और इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान तथा पितृ तर्पण की परिपाटी है, इसलिए श्रद्धालुओं के बीच इस बात को लेकर संशय था कि ग्रहण के साये में ये अनुष्ठान संभव हो पाएंगे या नहीं।
सावन अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग गणना के मुताबिक, सावन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि की शुरुआत 12 अगस्त को रात्रि 1:52 बजे से हो रही है, जो इसी दिन रात 11:06 बजे समाप्त हो जाएगी। उदयातिथि के अनुसार 12 अगस्त को ही सावन की 'हरियाली अमावस्या' मनाई जाएगी। इस दिन पुण्य स्नान और दान-पुण्य के लिए ब्रह्म मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ रहेगा, जो सुबह 4:23 बजे से 5:06 बजे तक है। इसके बाद प्रातः 5:49 बजे सूर्योदय के उपरांत भी भक्तगण स्नान-दान के अनुष्ठान कर सकते हैं।
भारत में सूतक काल की मान्यता नहीं
यह खगोलीय घटना यानी सूर्य ग्रहण 12 अगस्त की रात 9:04 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 13 अगस्त की सुबह 4:25 बजे तक रहेगी। सामान्यतः ग्रहण से 12 घंटे पूर्व सूतक काल प्रभावी हो जाता है, परंतु यह सूर्य ग्रहण भारत में अदृश्य (न दिखाई देने वाला) रहेगा। भारतीय भूभाग पर दिखाई न देने के कारण यहाँ इसका सूतक काल लागू नहीं होगा, जिससे प्रातःकाल होने वाले सावन अमावस्या के सभी मांगलिक व धार्मिक कार्य बिना किसी व्यवधान के संपन्न किए जा सकेंगे।
पितृ तर्पण और दान का विशेष महत्व
पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण हेतु सुबह 5:49 बजे से 9:07 बजे तक का समय अति उत्तम बताया गया है। इस दिन यजमान जल, श्वेत वस्त्र और खाद्यान्न का दान करके पितरों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को फल, वस्त्र, छत्र (छाता), जूते-चप्पल और कंबल इत्यादि भेंट करना शुभ फलदायी माना गया है। रात के समय ग्रहण होने और भारत में इसका प्रभाव न होने से सुबह के सभी अनुष्ठान पूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न किए जा सकेंगे।

