नए परमाणु सहयोग समझौते से मचा बवाल, अमेरिका-सऊदी डील पर उठे सवाल

वाशिंगटन: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते ने वैश्विक राजनीति और परमाणु सुरक्षा के गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। जिस यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) कार्यक्रम को लेकर अमेरिका सालों से ईरान पर कड़ा रुख अपनाता आ रहा है, अब वही तकनीक अपने सहयोगी देश सऊदी अरब को देने के कारण अमेरिकी प्रशासन आलोचनाओं के घेरे में आ गया है। जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन इसे ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक साझेदारी का एक बड़ा कदम बता रहा है, वहीं अमेरिकी कांग्रेस (संसद), परमाणु विशेषज्ञों और इजराइल के रणनीतिक विश्लेषकों ने इस पर गहरी चिंता जताई है।

सऊदी अरब में संवर्धन और अमेरिकी नियंत्रण का खाका

रिपोर्टों के अनुसार, इस समझौते के तहत सऊदी अरब को भविष्य में अपने देश में यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए कई सख्त शर्तें तय की गई हैं। प्रस्तावित योजना के मुताबिक, यदि संवर्धन की मंजूरी मिलती भी है, तो पूरी प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों की कड़ी निगरानी में होगी और संवर्धन से जुड़ी संवेदनशील तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी। इसके अलावा, परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और ईंधन की आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों की मुख्य भूमिका रहेगी, जिससे अमेरिकी कंपनी 'वेस्टिंगहाउस' के एपी-1000 रिएक्टरों के इस्तेमाल और व्यावसायिक लाभ के रास्ते खुलेंगे।

निरीक्षण में छूट पर उठ रहे सवाल

इस पूरे समझौते में सबसे विवादित पहलू अंतरराष्ट्रीय निगरानी से जुड़ा है। समझौते के तहत सऊदी अरब को सामान्य अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण व्यवस्था से विशेष छूट दी गई है, और निगरानी का जिम्मा सीधे अमेरिकी विशेषज्ञों को सौंपा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) जैसी वैश्विक निगरानी प्रणाली को कमजोर कर सकता है और भविष्य में अन्य देश भी इसी तरह की विशेष छूट की मांग कर सकते हैं। हालाँकि, अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट का दावा है कि यह समझौता अप्रसार मानकों और परमाणु सुरक्षा के उच्चतम स्तर को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

दोहरे रवैये पर अमेरिकी कांग्रेस में विरोध

समझौते की खबर सामने आते ही अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। सांसद ब्रैड शेरमन ने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि एक तरफ ईरान के यूरेनियम संवर्धन का कड़ा विरोध करना और दूसरी तरफ सऊदी अरब को इसकी अनुमति देना अमेरिका के दोहरे मानदंड (Double Standards) को दर्शाता है। वहीं विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सफाई देते हुए कहा कि अमेरिका ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा जिससे परमाणु हथियारों का प्रसार हो। इसके बावजूद, आगामी दो सालों तक सऊदी में संवर्धन की व्यावहारिक क्षमता का अध्ययन किया जाएगा, जिसने इजराइल और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

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