US 100 percent tariff : अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के बीच रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर संभावित 100 फीसदी टैरिफ का मुद्दा चर्चा में है. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को रूस और ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक को मंजूरी दी. अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास पहुंच गया है.
इस प्रस्ताव का असर रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर पड़ सकता है. चीन ने इस तरह के कदम पर आपत्ति जताते हुए अपने व्यापारिक संबंधों में तीसरे देशों के दबाव का विरोध किया है.
US 100 percent tariff:चीन का अमेरिका को जवाब,एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन का दूसरे देशों के साथ आर्थिक और व्यापारिक सहयोग किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाने के लिए नहीं होता. चीन के अनुसार, देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए.
चीनी पक्ष ने एकतरफा प्रतिबंधों और तथाकथित लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन का विरोध किया. बीजिंग का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग को तीसरे देश के दबाव के आधार पर नियंत्रित नहीं किया जाना चाहिए.
इस बयान का संदर्भ अमेरिका के उस विधेयक से है, जिसके तहत रूस की ऊर्जा खरीद से जुड़े देशों पर अतिरिक्त व्यापारिक शुल्क लगाने की संभावना बनाई गई है.
अमेरिकी संसद ने किस विधेयक को मंजूरी दी?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262 के मुकाबले 159 मतों से पारित किया. इससे पहले अमेरिकी सीनेट 7 अगस्त को इस विधेयक को 86-11 मतों से मंजूरी दे चुकी थी. समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक इस विधेयक का प्रमुख उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और यूक्रेन के खिलाफ युद्ध से जुड़े आर्थिक संसाधनों को सीमित करना है. इसमें रूस के अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान शामिल हैं.
क्या ट्रंप तुरंत 100 फीसदी टैरिफ लगा देंगे?
विधेयक अपने आप चीन या भारत के सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं करेगा बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति को परिस्थितियों के आधार पर ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार देगा. टैरिफ लगाने का फैसला राष्ट्रपति के निर्णय और कानून की शर्तें के मुताबिक ही लागू होगा.
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर क्या असर होगा?
विधेयक में रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था प्रस्तावित है. इसमें उन देशों को भी शामिल किया जा सकता है जो रूस के ऊर्जा प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं.
अमेरिकी हाउस वेज एंड मीन्स कमेटी के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था में रूसी उत्पादों पर 500 फीसदी तक शुल्क और पात्र देशों के सामान पर 100 फीसदी तक शुल्क का प्रावधान है.
हर 180 दिन में समीक्षा का प्रावधान
नये प्रस्ताव में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को हर 180 दिन में संबंधित देशों की सूची की समीक्षा करने का अधिकार देने का प्रावधान है . परिस्थितियों के अनुसार अन्य देशों को भी सूची में शामिल किया जा सकता है.
भारत और चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भारत और चीन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं. इसलिए इस तरह के अमेरिकी प्रतिबंध और टैरिफ प्रावधान दोनों देशों के व्यापारिक और ऊर्जा संबंधों पर असर डालने की संभावना है.
अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सामान की लागत में बढ़ोतरी होगी.
रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर व्यापारिक और कूटनीतिक दबाव बढेगा.
ऊर्जा आपूर्ति और आयात नीति पर नए निर्णयों की जरूरत होगी.
अमेरिका, चीन, भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव आ सकता है.
समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक इन प्रभावों की वास्तविक सीमा इस बात पर निर्भर करेगी कि कानून लागू होने के बाद अमेरिकी प्रशासन किन देशों और किन उत्पादों पर कितना शुल्क लगाता है.
रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के द्वारा पारित किये गये विधेयक का सबसे बड़ा उद्देश्य रूस की आर्थिक और ऊर्जा संबंधी गतिविधियों पर दबाव बढ़ाना है. इसमें रूसी बैंकों, अधिकारियों और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं के साथ-साथ प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाले तेल टैंकरों के नेटवर्क को भी निशाना बनाने की बात है.
हालांकि, ऐसे कदमों से अमेरिका के अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ सकता है. विधेयक के आलोचकों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने को लेकर चिंताएं जताई हैं.
कुल मिलाकर विधेयक अब राष्ट्रपति ट्रंप के पास है. हस्ताक्षर के बाद इसके कानून बनने और उसके बाद लागू किए जाने वाले प्रावधानों से संबंधित प्रशासनिक फैसले महत्वपूर्ण होंगे.
चीन का विरोध इस बात को रेखांकित करता है कि रूस से ऊर्जा खरीद और अमेरिकी प्रतिबंधों का मुद्दा केवल अमेरिका-रूस संबंधों तक सीमित नहीं है. इसका संबंध चीन, भारत समेत अन्य ऊर्जा आयातक देशों की व्यापारिक और कूटनीतिक नीतियों से भी है.
आने वाले समय में अमेरिकी प्रशासन के फैसलों और चीन की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कितना प्रभाव पड़ता है.

