नई दिल्ली: देश की सियासत में इन दिनों शिक्षा और उससे जुड़े अहम मुद्दे सबसे ऊपर बने हुए हैं। पेपर लीक जैसी घटनाओं को लेकर देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद भवन से लेकर प्रधानमंत्री आवास के बाहर तक जोरदार प्रदर्शन देखने को मिले हैं। राजनीति के गलियारों में बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं जब देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे गंभीर विषयों पर इतनी व्यापक चर्चा होती है।
पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के इस गरमाए माहौल के बीच यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि क्या देश का कुल शिक्षा बजट एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित करने में होने वाले खर्च से भी कम है। आइए विस्तार से जानते हैं कि भारत का कुल शिक्षा बजट वास्तव में कितना है, पिछले एक दशक से अधिक समय में इसमें क्या कुछ बदलाव आए हैं और वैश्विक पटल पर अन्य देश शिक्षा के क्षेत्र में कितना खर्च कर रहे हैं।
वर्तमान विवाद की पूरी पृष्ठभूमि
देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और नीट परीक्षा में हुई धांधली को लेकर छात्रों का रोष अब सड़कों से होता हुआ सीधे संसद तक पहुंच चुका है। इस अहम मुद्दे पर पिछले चार दिनों से संसद की कार्यवाही लगातार बाधित रही है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन 20 जुलाई को हुए संसद मार्च और उसमें घटी हिंसा के बाद भी अनवरत जारी है। प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ-साथ विपक्षी दल भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की मांग पर पूरी तरह अड़े हुए हैं। विपक्ष सदन के भीतर भी इस पर बहस की मांग कर रहा है। इन सबके बीच, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक से जुड़े मामलों के त्वरित और सख्त निपटारे के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का ऐलान किया है।
केंद्र सरकार का शिक्षा पर वित्तीय आवंटन
यूपीए सरकार के अपने कार्यकाल के अंतिम पूर्ण बजट (वर्ष 2013-14) के दौरान केंद्र सरकार का कुल बजट 16,65,297 करोड़ रुपये तय किया गया था। उस समय तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हिस्से में 65,867 करोड़ रुपये आए थे, जो कि कुल बजट का लगभग 3.96 प्रतिशत यानी करीब चार फीसदी के आसपास था।
इसके बाद, मोदी सरकार के पहले पूर्ण बजट (वर्ष 2014-15) में कुल केंद्रीय बजट का आकार बढ़कर 17,94,892 करोड़ रुपये हो गया, जिसमें तत्कालीन एमएचआरडी को 67,970 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो कुल बजट का लगभग 3.8 प्रतिशत था।
वर्ष 2016-17 के दौरान देश का कुल केंद्रीय बजट बढ़कर 19.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इस वर्ष शिक्षा मंत्रालय के खाते में 72,394 करोड़ रुपये आए, जो कि कुल बजट का करीब 3.66 प्रतिशत (लगभग 3.7%) था।
वर्ष 2017-18 में शिक्षा मंत्रालय को कुल 79,686 करोड़ रुपये की राशि मिली, जो कि 21.47 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट का लगभग 3.7 प्रतिशत हिस्सा था।
वर्ष 2019-20 में मंत्रालय को 94,853.64 करोड़ रुपये मिले, लेकिन 27,86,349 करोड़ रुपये के विशाल कुल बजट में इसकी हिस्सेदारी आंशिक रूप से घटकर करीब 3.4 प्रतिशत पर आ गई।
वर्ष 2020-21 में शिक्षा मंत्रालय के लिए 99,312 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जो 30,42,230 करोड़ रुपये के कुल बजट का लगभग तीन प्रतिशत बनता है।
वर्ष 2021-22 में यह आवंटन 93,224 करोड़ रुपये रहा और 34,83,236 करोड़ रुपये के कुल बजट में इसकी हिस्सेदारी और कम होकर लगभग 2.6 फीसदी रह गई।
वर्ष 2022-23 के दौरान शिक्षा मंत्रालय को 1,04,278 करोड़ रुपये मिले, जो 39,44,909 करोड़ रुपये के कुल बजट का लगभग 2.6 प्रतिशत ही था।
वर्ष 2023-24 में मंत्रालय का बजट बढ़कर आब्जेक्टिव रूप से 1,12,899 करोड़ रुपये जरूर हुआ, लेकिन ₹45,03,097 करोड़ के कुल बजट में इसकी हिस्सेदारी गिरकर करीब 2.5 प्रतिशत पर पहुंच गई।
वर्ष 2024-25 में शिक्षा मंत्रालय के हिस्से 1,21,118 करोड़ रुपये आए, जो 48.20 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट का लगभग 2.5 प्रतिशत था।
वर्ष 2025-26 में शिक्षा का कुल बजट बढ़कर 1,28,650 करोड़ रुपये हुआ, जबकि उस साल का कुल केंद्रीय बजट 50.65 लाख करोड़ रुपये था और शिक्षा की हिस्सेदारी लगभग 2.5 प्रतिशत पर ही टिकी रही।
आगामी वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय के लिए 1,39,289 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है, परंतु 53.47 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम कुल बजट में इसकी हिस्सेदारी केवल लगभग 2.6 प्रतिशत ही है।
बजट की राशि बढ़ी, लेकिन कुल हिस्सेदारी में आई गिरावट
सरसरी तौर पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार का खर्च लगातार बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2013-14 में शिक्षा क्षेत्र का बजट 65,867 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर 1,39,289 करोड़ रुपये हो गया है। यानी पिछले 13 वर्षों में यह राशि दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। परंतु दूसरी तरफ, अगर कुल केंद्रीय बजट के मुकाबले तुलना की जाए, तो शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार कम हुई है। वर्ष 2013-14 में यह करीब 4 प्रतिशत हुआ करती थी, जो वर्ष 2026-27 में घटकर महज 2.6 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गई है।
जीडीपी का कितना प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का है लक्ष्य?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत यह स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि केंद्र और राज्य सरकारों का कुल सार्वजनिक शिक्षा खर्च देश की कुल जीडीपी के 6 प्रतिशत तक पहुंचाया जाए। हालांकि, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022-23 तक यह खर्च केवल 4.1 प्रतिशत जीडीपी तक ही सीमित था और वर्तमान में भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को जो 1,39,289 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, वे वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमानों से लगभग 14 प्रतिशत अधिक हैं। इस कुल राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा यानी 83,562 करोड़ रुपये स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अधीन रहेगा, जबकि शेष 40 प्रतिशत यानी 55,727 करोड़ रुपये उच्च शिक्षा विभाग को दिए जाएंगे।
वर्ष 2017-18 से लेकर 2024-25 के बीच शिक्षा मंत्रालय का वास्तविक खर्च औसतन 5 प्रतिशत सीएजीआर (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) की रफ्तार से आगे बढ़ा है। वहीं दूसरी ओर, संसद की एक स्थायी समिति ने देश में लगातार बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक वर्ष शिक्षा बजट में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि करने की सिफारिश की थी।
वर्ष 2025-26 के दौरान मंत्रालय ने अपनी कुल आवंटित राशि का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा सफलतापूर्वक उपयोग कर लिया था। हालांकि, समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया था कि स्कूल शिक्षा विभाग फरवरी 2025 तक अपने फंड का केवल 59 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च कर पाने में सक्षम हो पाया था।
देशभर के स्कूलों के विकास से जुड़ी 'समग्र शिक्षा योजना' के लिए इस बार 42,100 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह राशि शिक्षा मंत्रालय के कुल बजट का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है और यह वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमानों से 11 प्रतिशत अधिक है।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियां
माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर घटता छात्र नामांकन: राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूल शिक्षा के सभी चरणों में 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात (GER) हासिल करना है। परंतु वर्ष 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि माध्यमिक स्तर पर यह अनुपात 79 प्रतिशत और उच्च माध्यमिक स्तर पर गिरकर केवल 58 प्रतिशत पर आ गया है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में उच्च माध्यमिक विद्यालयों की कम संख्या होना तथा आर्थिक तंगी के चलते कम उम्र में बच्चों का काम-धंधों से जुड़ जाना इसके मुख्य कारण हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024-25 तक देश भर के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 10 लाख पद खाली पड़े थे। इसके अलावा, प्री-प्राइमरी स्तर पर पढ़ाने वाले 52 प्रतिशत शिक्षक पेशेवर रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। अन्य शैक्षणिक स्तरों पर भी 10 प्रतिशत से अधिक शिक्षक वे बुनियादी योग्यताएं पूरी नहीं करते जो शिक्षण कार्य के लिए आवश्यक हैं।
रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई है कि देश के कई सरकारी स्कूलों में आज भी आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, हाई-स्पीड इंटरनेट, स्मार्ट क्लासरूम और दिव्यांग विद्यार्थियों के अनुकूल बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। हालांकि सरकार डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के दावे कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्कूलों के बीच डिजिटल खाई अभी भी गहरी बनी हुई है।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी गंभीर बाधाएं: एनईपी का लक्ष्य वर्ष 2030 तक उच्च शिक्षा में जीईआर को 50 प्रतिशत तक ले जाने का है, जबकि वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा केवल 28 प्रतिशत पर अटका हुआ था। इसके अतिरिक्त, देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग 29 प्रतिशत फैकल्टी के पद खाली पड़े हैं। यही नहीं, आईआईटी (IIT), आईआईआईटी (IIIT) और एनआईटी (NIT) जैसे देश के प्रीमियम संस्थानों में भी प्रोफेसरों और शिक्षकों के भारी पद रिक्त चल रहे हैं।
विश्वविद्यालयों में अनुसंधान और शोध की सीमित भूमिका: विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का कुल रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) खर्च देश की जीडीपी का महज 0.64 प्रतिशत है, और इस छोटे से हिस्से में भी विश्वविद्यालयों की भागीदारी केवल 9 प्रतिशत के आसपास है। विश्लेषक इसे देश की उच्च शिक्षा और शोध प्रणाली के सामने एक बहुत बड़ी संरचनात्मक चुनौती मानते हैं।
शिक्षा पर खर्च के मामले में वैश्विक स्तर पर अन्य देशों की स्थिति
विजुअल कैपिटलिस्ट द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफ्रीकी देश नामीबिया शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला राष्ट्र है, जो अपनी कुल जीडीपी का 9.1 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर व्यय करता है।
नामीबिया के बाद इस सूची में क्यूबा (8.4%), बोलीविया (7.5%), फिनलैंड (6.4%) और दक्षिण अफ्रीका (6%) जैसे देश प्रमुखता से शामिल हैं।
इसके विपरीत, नाइजीरिया दुनिया में शिक्षा पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शुमार है, जहां शिक्षा पर होने वाला कुल व्यय देश की जीडीपी का मात्र 0.3 प्रतिशत है।
यदि दुनिया की अन्य बड़ी महाशक्तियों की बात करें, तो संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी जीडीपी का लगभग 5.4 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा क्षेत्र पर खर्च करता है।
वहीं, एशियाई महाशक्ति चीन अपनी जीडीपी का 3.9 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर लगाता है, जबकि रूस अपनी जीडीपी का 4.2 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र के लिए आवंटित करता है।
इसके साथ ही, भारत के दो प्रमुख पड़ोसी देश—पाकिस्तान और बांग्लादेश—अपनी कुल जीडीपी का लगभग दो फीसदी हिस्सा शिक्षा व्यवस्था पर खर्च कर रहे हैं।

