क्या है परिसीमन विधेयक 2026, क्यों 360 सासंदों को जुटाने में लगी है मोदी सरकार ?

Mission Delimitation Bill : एक तरफ टीएमसी तो दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे की शिवसेना में सांसदों की टूट का खेल चल रहा है, इसके अलावा कई और राजनीतिक दल हैं, जिनमें टूट की चर्चा चल रही है. माना जा रहा है कि ये सारी जोड़-तोड़ संसद में पिरसीमन बिल 2026 को पास कराने के लिए किया जा रहा है.

पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र और तमिलनाडु तक विपक्षी दलों में मची हलचल ने इस चर्चा को और ज्यादा सुर्खियों में ला दिया है. पिछले सत्र में भी  चर्चा थी कि मोदी सरकार संसद में पिरसीमन बिल लेकर आ सकती है लेकिन शायद नंबर अपनी पक्ष में ना देखते हुए सरकार ने अपना इरादा बदल दिया. अब एक बार फिर से राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नरेंद्र मोदी सरकार आगामी संसद सत्र में इस महत्वपूर्ण विधेयक को फिर से पेश कर सकती है. गौर करने वाली बात ये है कि अगर सरकार इस बिल को पास करना चाहती है तो उन्हें इसके लिए 540 सांसदों में कम से कम 360 सांसदों का समर्थन मिलना जरुरी होगा. माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक चल रही जोड़- तोड़ की ये कवायद इसी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की रणनीति का ही हिस्सा है.

विपक्षी दलों में संभावित टूट और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि क्या इस बार सरकार के लिए संसद का गणित आसान हो जाएगा.

Mission Delimitation Bill (परिसीमन विधेयक) क्या है ?

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या में हुए बदलाव के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं और संख्या का पुनर्निर्धारण करना. संविधान के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों का पुनर्गठन होना चाहिए, लेकिन 1976 में इसे रोक दिया गया था. बाद में यह रोक बढ़ाते हुए 2026 तक लागू रखी गई.

अब सरकार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है. चर्चा है कि मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 तक किया जा सकता है. सरकार का तर्क है कि पिछले पांच दशकों में देश की आबादी में भारी वृद्धि हुई है और मौजूदा सांसदों पर मतदाताओं का बोझ बहुत बढ़ गया है.

दक्षिण भारत क्यों कर रहा विरोध?

परिसीमन को लेकर सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण भारत के राज्यों में है. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है.

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. ऐसे में यदि सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उत्तर भारत की सीटों में बड़ा इजाफा हो सकता है. दक्षिणी राज्यों को डर है कि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव कम हो जाएगा.

अप्रैल 2026 में सरकार को क्यों मिली थी हार?

17 अप्रैल 2026 को संसद में सरकार को एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक पर झटका लगा था. महिला आरक्षण और लोकसभा विस्तार से जुड़े विधेयकों के पैकेज को पास कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी.

लोकसभा में उस दिन 528 सांसद मौजूद थे. विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट पड़े. सरकार आवश्यक संख्या से काफी पीछे रह गई. विपक्षी INDIA गठबंधन ने एकजुट होकर इसका विरोध किया और आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के बहाने देश का चुनावी नक्शा बदलना चाहती है.

नतीजतन सरकार को संबंधित विधेयकों को वापस लेना पड़ा.

टीएमसी में बगावत ने बढ़ाई चर्चा

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरों ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है. चर्चा है कि पार्टी के कई सांसद नेतृत्व से नाराज हैं और संसद में अलग पहचान की मांग कर रहे हैं.

यदि ऐसे सांसद भविष्य में सरकार के पक्ष में मतदान करते हैं या मतदान से दूरी बनाते हैं, तो संसद में सत्ता पक्ष का गणित मजबूत हो सकता है.

उद्धव ठाकरे की पार्टी में भी संकट?

महाराष्ट्र में भी राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं कि कुछ सांसद अलग राह चुन सकते हैं. हालांकि पार्टी नेतृत्व ऐसे दावों को खारिज कर रहा है, लेकिन लगातार बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों ने चर्चाओं को हवा दी है. टूट की खबरों के इस बात से भी मजबूती मिल रही है क्योंकि गुरुवार को पार्टी ने व्हीप जारी करके अपने सभी सांसदों को बैठक के लिए बुलाया था लेकिन बैठक में 8 सांसदों मे से केवल 2 सांसद ही पहुंचे.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों की संख्या में थोड़ी भी कमी आती है तो संविधान संशोधन जैसे विधेयकों पर सरकार की स्थिति मजबूत हो सकती है.

डीएमके की भूमिका पर भी नजर

तमिलनाडु की राजनीति भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मानी जा रही है. यदि किसी कारणवश डीएमके और उसके सहयोगी सांसद मतदान के दौरान अनुपस्थित रहते हैं तो सदन में कुल प्रभावी संख्या घट सकती है. ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी कम हो जाएगा, जिससे सरकार के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान हो सकता है.

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से भी जुड़ सकता है मुद्दा

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि मोदी सरकार परिसीमन विधेयक को “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसे बड़े सुधारों के साथ जोड़कर पेश कर सकती है. इसके अलावा आगामी राज्यसभा चुनावों के बाद एनडीए की ताकत बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है.

आगे क्या होगा?

परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीतिक शक्ति के संतुलन से जुड़ा मुद्दा बन चुका है. एक तरफ सरकार इसे बेहतर प्रतिनिधित्व का माध्यम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष और दक्षिणी राज्य इसे राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश मान रहे हैं.

आने वाले संसद सत्र में यह साफ हो सकता है कि क्या मोदी सरकार इस महत्वाकांक्षी विधेयक को आगे बढ़ा पाती है या फिर विपक्ष एक बार फिर उसके रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा होता है.

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