नवजात शिशु को शहद चटाना पड़ सकता है भारी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

भारत में पारंपरिक रूप से नवजात बच्चों की परवरिश को लेकर कई तरह के रीति-रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं। इन्हीं में से एक बेहद आम रिवाज है बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसे 'शहद' चटाना या घुट्टी देना। समाज के बड़े-बुजुर्गों का ऐसा मानना है कि शिशु को शहद देने से उसका स्वभाव मधुर होता है और उसकी सेहत तंदुरुस्त रहती है। हालांकि, देश की राजधानी नई दिल्ली के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इस पारंपरिक धारणा को पूरी तरह असुरक्षित करार दिया है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नवजात शिशुओं का पाचन तंत्र (डाइजेस्टिव सिस्टम) और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) जन्म के समय पूरी तरह मैच्योर नहीं होती है। ऐसे में शहद जैसी भारी और बैक्टीरिया युक्त चीज का सेवन उनके नाजुक शरीर के लिए अत्यंत घातक साबित हो सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि अनजाने में उठाया गया यह कदम बच्चे को जीवन जोखिम में डाल सकता है। आइए जानते हैं नवजात को शहद न देने के पीछे के वैज्ञानिक कारण और डॉक्टर इस विषय पर क्या हिदायत देते हैं:

एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्यों वर्जित है शहद?

शिशु रोग विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक बच्चा कम से कम एक वर्ष (12 महीने) का न हो जाए, तब तक उसकी डाइट में शहद की एक बूंद भी शामिल नहीं करनी चाहिए। नवजात शिशु की आंतें इतनी संवेदनशील होती हैं कि वे शहद के भीतर छिपे सूक्ष्म कीटाणुओं के प्रभाव को झेलने में सक्षम नहीं होतीं।

शहद के सेवन से होने वाले 3 बड़े खतरे

  1. इन्फेंट बोटुलिज्म (Infant Botulism) का गंभीर जोखिम: नवजात बच्चों को शहद से दूर रखने का सबसे मुख्य कारण 'इन्फेंट बोटुलिज्म' नामक एक दुर्लभ लेकिन बेहद खतरनाक बीमारी है। शहद में 'क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम' (Clostridium Botulinum) नाम के बैक्टीरिया के स्पोर्स (बीजाणु) पाए जाते हैं। ये स्पोर्स बड़े बच्चों या वयस्कों के पेट में जाकर कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, क्योंकि उनका पाचन तंत्र मजबूत होता है। मगर एक साल से छोटे शिशुओं की अविकसित आंतों में पहुँचते ही ये कीटाणु तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं और एक खतरनाक जहर (टॉक्सिन) रिलीज करते हैं।

  2. श्वसन तंत्र का कमजोर होना और सांस लेने में तकलीफ: यदि बच्चा बोटुलिज्म की चपेट में आ जाता है, तो यह टॉक्सिन सीधे उसके नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) और मांसपेशियों पर हमला करता है। इससे शिशु के फेफड़ों और श्वसन तंत्र की मांसपेशियां शिथिल पड़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे को सांस लेने में भारी दिक्कत होने लगती है। इसके लक्षणों में बच्चे का बहुत धीमे या कमजोर आवाज में रोना, अत्यधिक सुस्ती छा जाना, दूध निगलने में परेशानी होना और शरीर का बिल्कुल ढीला पड़ जाना शामिल है।

  3. पेट की बीमारियां और इंफेक्शन का डर: नवजात का आमाशय केवल मां के दूध को पचाने के लिए ही तैयार होता है। शहद जैसी गाढ़ी और जटिल संरचना वाली चीज को पचाने में उसके अंगों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप शिशुओं में गंभीर कब्ज (Constipation), पेट में मरोड़, गैस, उल्टी और आंतों का संक्रमण होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

शिशु की सुरक्षा के लिए डॉक्टरों की गाइडलाइंस

  • अमृत समान है पहला दूध: बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसे किसी भी अन्य चीज के बजाय मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) ही दिया जाना चाहिए, जो प्राकृतिक वैक्सीन का काम करता है।

  • 6 महीने का कड़ा नियम: जीवन के शुरुआती 6 महीनों तक शिशु को पानी की एक बूंद भी ऊपर से न दें; उसे केवल और केवल स्तनपान (Exclusive Breastfeeding) ही कराएं।

  • बाहरी चीजों पर पूर्ण प्रतिबंध: शहद, जन्म घुट्टी, चीनी का पानी या कोई भी पारंपरिक काढ़ा डॉक्टरों की लिखित सलाह के बिना नवजात के मुंह में बिल्कुल न डालें।

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