मनोरंजन डेस्क : भारतीय सिनेमा में ऐसी फिल्में बहुत कम बनती हैं जो खेल की रफ्तार, गहरे पारिवारिक जज्बात और खालिस व्यावसायिक मनोरंजन के मानकों पर एक साथ खरी उतर सकें। अक्सर निर्देशक किसी एक हिस्से को संवारने के चक्कर में दूसरे हिस्से को कमजोर कर बैठते हैं, लेकिन पेड्डी इन तीनों ही मोर्चों पर एक गजब के आत्मविश्वास के साथ खुद को साबित करती है। यह फिल्म सिर्फ देखने के लिए नहीं बनी है, बल्कि इसे सिनेमाघर के बड़े पर्दे पर पूरे शोर-शराबे और दर्शकों की तालियों के बीच महसूस किया जाना चाहिए। इसके जादुई और बेहद दमदार शुरुआती दृश्य से लेकर दर्शकों को भीतर तक झकझोर देने वाले इसके अंतिम क्लाइमेक्स तक, पूरी फिल्म कहानी की कमान को अपने हाथ से छूटने नहीं देती। निर्देशक बुची बाबू सना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आखिर क्यों उन्हें समकालीन भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मोहक और भरोसेमंद कहानीकारों में गिना जाता है। उनका यह नया प्रयास कैनवास के मामले में जितना भव्य और महत्वाकांक्षी है, इसकी आत्मा उतनी ही जमीन से जुड़ी हुई और किरदारों के जज्बातों के करीब है।
बड़े पर्दे पर जज्बात और जुनून की एक मुकम्मल कहानी Peddi
इस पूरी फिल्म की बुनियाद आत्मसम्मान, कभी न टूटने वाले हौसले और अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी जैसे बेहद संजीदा और जरूरी विषयों पर टिकी है। निर्देशक ने इन मुद्दों को केवल ऊपरी तौर पर छूने के बजाय इनकी गहराई में जाकर पड़ताल की है, जो फिल्म को न केवल एक मजबूत भावनात्मक आधार देती है बल्कि इसे सामाजिक रूप से भी प्रासंगिक बनाती है। यही कारण है कि यह फिल्म किसी काल्पनिक दुनिया की कहानी न लगकर हमारे अपने बीच के एक आम इंसान की लड़ाई लगने लगती है। बुची बाबू सना इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि करोड़ों का बजट और चमचमाती सिनेमैटोग्राफी तब तक किसी काम की नहीं होती, जब तक दर्शक पर्दे पर चल रहे किरदार के सुख-दुख को अपना न समझ बैठें। Peddi में उन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के तड़क-भड़क वाले फॉर्मूले और कलात्मक ईमानदारी के बीच एक ऐसा संतुलन बिठाया है, जो दर्शकों को मनोरंजन की एक नई दुनिया में ले जाता है। यह एक ऐसी फिल्म बनकर उभरी है जो सिनेमाघर से बाहर आने के बाद भी आपके भीतर एक खास तरह का जोश और खुमार छोड़ जाती है।
मुख्य भूमिका में हैं रामचरण
राम चरण ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाते हुए एक ऐसा अभिनय किया है जिसे आने वाले कई सालों तक उनके करियर के सबसे चमकदार और बेहतरीन मील के पत्थरों में गिना जाएगा। उन्होंने अपने इस किरदार में गजब की तीक्ष्णता, एक खास तरह का आकर्षण और गजब की भावनात्मक ईमानदारी फूंक दी है। यही वजह है कि जब उनका किरदार स्क्रीन पर एक असाधारण और मुश्किलों से भरी जीवन यात्रा पर निकलता है, तो दर्शक हर मोड़ पर खुद को उससे जुड़ा हुआ पाते हैं। उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक पल में बेहद आक्रामक और दूसरे ही पल में उतने ही भावुक और संवेदनशील दिखने की कला में पूरी तरह माहिर नजर आते हैं। उनके चेहरे के हाव-भाव और उनकी खामोशी भी स्क्रीन पर एक लंबा संवाद बोल जाती है। इस फिल्म के लिए किया गया उनका शारीरिक और मानसिक बदलाव साफ तौर पर पर्दे पर उनकी मेहनत के रूप में दिखाई देता है। यह एक ऐसा परिवर्तनकारी रोल है जो अभिनेता के रूप में उनकी साख को एक अलग ही ऊंचाई पर ले जाता है।
खेल के जज्बे और भावनाओं का बेजोड़ मेल
फिल्म के भीतर खेल के मैदान और अखाड़े के जितने भी दृश्य रखे गए हैं, वे हाल के वर्षों के सबसे रोमांचक और रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्यों में से एक हैं। इन दृश्यों का पैमाना बेहद विशाल और देखने में अंतरराष्ट्रीय स्तर का लगता है, लेकिन इनकी असली खूबसूरती उस तगड़े भावनात्मक दांव में छिपी है जो हर एक मुकाबले के पीछे लगा हुआ है। यहां हर एक मैच केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि वह नायक के वजूद, उसकी साख और उसके अपनों की उम्मीदों की एक बहुत बड़ी और आखिरी जंग है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह दर्शकों के भीतर प्रेरणा जगाने के साथ-साथ उनका भरपूर मनोरंजन भी करती है। खेल के दौरान आने वाले उतार-चढ़ाव और नायक का अपनी कमजोरियों पर काबू पाकर फिर से उठ खड़े होना, सिनेमाघर में बैठे दर्शकों के भीतर एक अद्भुत ऊर्जा भर देता है। निर्देशक ने ट्रेनिंग सीन्स से लेकर अंतिम मुकाबले तक, हर एक फ्रेम को इस तरह से बुना है कि दर्शक अपनी सीटों से बंधे रहने पर मजबूर हो जाते हैं।
Peddi की तकनीक है शानदार
इस बेहद भव्य और बड़े सिनेमाई सपने को जमीन पर उतारने के लिए एक बहुत ही सधे हुए तकनीकी सहयोग की जरूरत थी, और फिल्म की लेखन तथा संगीत टीम ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। बुची बाबू सना, कृष्ण हरि, नागेंद्र कासी और वारा प्रकाश तोलेटी द्वारा लिखे गए संवाद फिल्म के सबसे अहम मोर्चों पर जान डालने का काम करते हैं। ये संवाद बिना किसी फूहड़पन के, सीधे दर्शकों के दिलों पर चोट करते हैं और सिनेमाघर में तालियां बटोरने का माद्दा रखते हैं। इसके साथ ही, हरि, चिंताकिंदी श्रीनिवास, वेमा रेड्डी और सुनील माधव की पूरी राइटिंग टीम ने मिलकर एक ऐसा कसा हुआ स्क्रीनप्ले तैयार किया है जो फिल्म की रफ्तार को कहीं भी ढीला नहीं पड़ने देता। यह टीम व्यावसायिक सिनेमा की उस सबसे बड़ी बीमारी से पूरी तरह बचने में सफल रही है, जहां फिल्म का दूसरा हिस्सा अक्सर अपनी दिशा भटक जाता है।
फिल्म का संगीत दृश्यों को गहराई देता है
फिल्म का संगीत और इसके बोल इसकी कहानी के पीछे चल रही एक अदृश्य धड़कन की तरह हैं जो दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। अनंत श्रीराम, बालाजी, गणेश और सालादी के लिखे गीत कहानी के दृश्यों के साथ इस तरह घुले-मिले हैं कि वे जबरदस्ती ठूंसे हुए नहीं लगते, बल्कि नैरेटिव को आगे ले जाने का जरिया बनते हैं। ये गीत फिल्म के गंभीर और भावुक दृश्यों को एक नई गहराई देते हैं। वहीं दूसरी तरफ, जाने-माने कोरियोग्राफर बोस्को मार्टिस ने फिल्म में बेहद ऊर्जावान और स्क्रीन पर आग लगा देने वाले डांस स्टेप्स तैयार किए हैं, जो राम चरण की बेमिसाल डांसिंग प्रतिभा का पूरा और सही इस्तेमाल करते हैं। यह संगीत और नृत्य का ऐसा मेल है जो दर्शकों को बड़े पर्दे पर एक शुद्ध और बेदाग सिनेमाई खुशी का अहसास कराता है।
Peddi एक मुकम्मल सिनेमाई पैकेज है
बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की पसंद के नजरिए से बात की जाए तो पेड्डी एक मुकम्मल सिनेमाई पैकेज है, जिसकी इस समय थिएटर्स को सबसे ज्यादा दरकार है। यह फिल्म समाज के हर वर्ग को अपनी तरफ खींचने का दम रखती है। जहां एक तरफ आम दर्शकों के लिए इसमें जबरदस्त एक्शन, सीटी-मार डायलॉग्स और थिरकने पर मजबूर कर देने वाले गाने हैं, वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक दर्शकों के लिए इसमें एक बेहद साफ-सुथरी कहानी और दिल को छू लेने वाले जज्बात हैं। यहां तक कि सिनेमा के कद्रदान और आलोचक भी इसके सधे हुए निर्देशन और तकनीकी बारीकियों की तारीफ करने से खुद को नहीं रोक पाएंगे। अंततः, पेड्डी केवल एक स्पोर्ट्स ड्रामा न रहकर इंसानी जज्बे, कभी न खत्म होने वाले विश्वास और संघर्षों पर अंतिम जीत का एक बेहद खूबसूरत और शानदार जश्न बन जाती है। यह एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जो यह याद दिलाता है कि जब पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ फिल्में बनाई जाती हैं, तो वे दर्शकों के दिलों पर कैसा राज करती हैं। इसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने की राह देखना वक्त की बर्बादी होगी, इस शानदार अनुभव को सिर्फ और सिर्फ सिनेमाघर की बड़ी स्क्रीन पर ही जिया जाना चाहिए।
स्टार रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5 स्टार)
निर्देशक: बुची बाबू सना
मुख्य कलाकार: राम चरण, जाह्नवी कपूर, शिव राजकुमार
संगीत: ए. आर. रहमान
फिल्म जॉनर: स्पोर्ट्स ड्रामा / एक्शन

