बिहार CET B.Ed परीक्षा पर उठे गंभीर सवाल! टेंडर खेल और 24 घंटे के यू-टर्न ने बढ़ाई BRABU की मुश्किलें

BRABU University Tender Scam: मुजफ्फरपुर: बिहार में लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी ‘CET B.Ed 2026’ परीक्षा शुरू होने से पहले ही बड़े विवादों के घेरे में आ गई है. परीक्षा आयोजित कराने की जिम्मेदारी संभाल रहे बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) की कार्यप्रणाली पर अब लगातार गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. निविदा (Tender) प्रक्रियाओं में विसंगतियों और प्रशासनिक यू-टर्न ने इस पूरी परीक्षा की पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

आइए समझते हैं कि आखिर इस पूरे मामले में परत-दर-परत क्या विवाद सामने आए हैं और क्यों छात्रों व अभिभावकों के बीच भारी आक्रोश है.

BRABU University Tender Scam, खेल नंबर 1: बिना टेंडर फाइनल हुए ही लाइव हो गया आवेदन पोर्टल!

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब मीडिया रिपोर्ट्स में एक चौंकाने वाला दावा किया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, CET B.Ed 2026 का आवेदन पोर्टल टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही लाइव (चालू) कर दिया गया था. अब शिक्षा जगत में यह बड़ा सवाल गूंज रहा है कि जब परीक्षा कराने वाली अधिकृत एजेंसी का चयन ही नहीं हुआ था, तो आवेदन प्रक्रिया किसके माध्यम से और किस अधिकार से संचालित की जा रही थी? क्या इसके लिए नियम-कानूनों को ताक पर रखा गया?

खेल नंबर 2: दो अलग-अलग सेवाओं का ‘अनोखा’ पैकेज

विवाद की दूसरी कड़ी 18 मई को सामने आई, जब विश्वविद्यालय ने परीक्षा सुरक्षा से जुड़ा एक टेंडर जारी किया। इस टेंडर में बायोमेट्रिक सत्यापन (Biometric Verification) और मोबाइल जैमर (Mobile Jammer) जैसी दो पूरी तरह से अलग-अलग तकनीकी सेवाओं को एक ही पैकेज में जोड़ दिया गया।

विशेषज्ञों की राय: परीक्षा सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जैमर सेवाएं आमतौर पर BEL और ECIL जैसे बेहद सीमित सरकारी उपक्रमों के पास ही उपलब्ध होती हैं। दूसरी तरफ, बायोमेट्रिक सत्यापन एक अत्यंत संवेदनशील काम है जिसके लिए विशेष अनुभव की जरूरत होती है। हैरानी की बात यह रही कि विश्वविद्यालय ने टेंडर में बायोमेट्रिक सत्यापन के लिए ‘अनुभव’ की शर्त को अनिवार्य ही नहीं बनाया। कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या किसी खास एजेंसी को फायदा पहुंचाने के लिए अनुभवी कंपनियों को रेस से बाहर रखने की कोशिश थी?

खेल नंबर 3: 24 घंटे में यू-टर्न, नियमों की उड़ी धज्जियां!

जब इस अजीबोगरीब टेंडर पर विवाद बढ़ा, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने बैकफुट पर आते हुए 20 मई को एक शुद्धिपत्र (Corrigendum) जारी किया और जैमर सेवाओं को टेंडर से अलग कर दिया, लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट इसके ठीक बाद आया.

महज 24 घंटे के भीतर विश्वविद्यालय ने अपने ही इस फैसले को पलट दिया. Corrigendum को वापस ले लिया गया और दोनों सेवाओं (जैमर और बायोमेट्रिक) को फिर से एक साथ जोड़ दिया गया.

अब विश्वविद्यालय प्रशासन को इन कड़े सवालों के जवाब देने होंगे:

  1. आखिर 24 घंटे के भीतर ऐसा क्या हुआ कि विश्वविद्यालय को अपना ही फैसला बदलना पड़ा?

  2. क्या अधिकारियों पर किसी प्रकार का कोई अदृश्य दबाव था?

  3. अगर एक बार दोनों सेवाओं को अलग किया जा सकता था, तो दोबारा जोड़ने के पीछे क्या मंशा थी?

  4. पहला फैसला गलत था या बाद वाला? या फिर पूरी स्क्रिप्ट पहले से ही तय थी?

दांव पर है लाखों छात्रों का भविष्य, उठ रही निष्पक्ष जांच की मांग

पिछले कुछ वर्षों में देश और राज्य के भीतर कई प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘मुन्नाभाइयों’ (फर्जी अभ्यर्थियों) के बैठने, पेपर लीक और सुरक्षा में सेंधमारी के बड़े मामले सामने आए हैं. ऐसे में अगर परीक्षा की सुरक्षा से जुड़ी निविदा (Tender Process) ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो परीक्षा की सुचिता पर सवाल उठना लाजिमी है.

यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि बिहार के लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है. यही वजह है कि अब शिक्षाविदों और छात्र संगठनों द्वारा इस पूरे मामले की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की जा रही है, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

बड़ा सवाल: अब देखना यह है कि क्या राजभवन और शिक्षा विभाग इस मामले में संज्ञान लेता है? क्या बिहार के छात्रों को एक पारदर्शी, निष्पक्ष और सुरक्षित परीक्षा का भरोसा मिल पाएगा?

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