ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास की नई उड़ान या प्रकृति से खिलवाड़? जानें ₹92,000 करोड़ की योजना का सच

Great Nicobar Project : भारत सरकार का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है. जहाँ एक तरफ केंद्र सरकार इसे देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेम चेंजर’ मान रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और सोशल मीडिया पर पर्यावरण को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह प्रोजेक्ट क्या है और इस पर विवाद क्यों हो रहा है ?

Great Nicobar Project क्या है ?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है, जिसे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप पर विकसित किया जा रहा है। NITI आयोग द्वारा 2021 में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत ₹72,000 से ₹92,000 करोड़ के बीच है.

इस विशाल परियोजना के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित हैं:

  • इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: एक गहरा बंदरगाह जहाँ दुनिया के सबसे बड़े जहाज आ सकेंगे.

  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट: नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी.

  • पावर प्लांट: 450 MVA का गैस और सोलर आधारित बिजली घर.

  • स्मार्ट टाउनशिप: एक आधुनिक शहर का निर्माण जहाँ सभी आधुनिक सुविधाएँ होंगी.

रणनीतिक और आर्थिक फायदे: क्यों जरूरी है यह प्रोजेक्ट?

भारत के लिए यह प्रोजेक्ट केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि हिंद महासागर में अपनी धक जमाने का एक जरिया है.

  1. चीन की घेराबंदी: यह द्वीप मलक्का स्ट्रेट के करीब है, जहाँ से दुनिया का 30% व्यापार गुजरता है. यहाँ सैन्य उपस्थिति बढ़ने से चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को जवाब देने में मदद मिलेगी.

  2. राजस्व की बचत: वर्तमान में भारत को विदेशी पोर्ट्स (सिंगापुर, कोलंबो) पर निर्भर रहना पड़ता है. इस पोर्ट के बनने से 2040 तक सालाना ₹30,000 करोड़ का फायदा हो सकता है.

  3. रोजगार: इस प्रोजेक्ट से करीब 40 से 50 हजार नई नौकरियाँ पैदा होने की उम्मीद है.

पर्यावरण और आदिवासियों पर विवाद: क्यों उठ रहे हैं सवाल?

विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी और पर्यावरणविदों का आरोप है कि यह प्रोजेक्ट एक ‘पारिस्थितिक अपराध’ है.

  • जंगल की कटाई: आरोप है कि करीब 160 वर्ग किलोमीटर जंगल काटा जाएगा, जिससे लाखों पेड़ों को नुकसान होगा.

  • आदिवासी विरासत: शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों की संस्कृति और उनके निवास स्थान पर खतरे की आशंका जताई जा रही है.

  • समुद्री जीव: पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि इससे कोरल रीफ और समुद्री कछुओं के प्रजनन स्थलों को भारी नुकसान पहुँचेगा.

सरकार का पक्ष: क्या सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं?

सरकार ने इन सभी चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया गया है. सरकार के अनुसार:

  • कुल जंगल क्षेत्र का केवल 1.82% ही प्रभावित होगा.

  • काटे गए पेड़ों के बदले हरियाणा और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाएगा.

  • आदिवासियों का कोई विस्थापन नहीं होगा और उनकी सुरक्षा के लिए जारावा और शोम्पेन पॉलिसी का सख्ती से पालन किया जाएगा.

क्या आप जानते हैं? हालांकि यह मोदी सरकार का प्रोजेक्ट है, लेकिन 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीवा गांधी ने भी अंडमान-निकोबार को सिंगापुर जैसा ट्रेड हब बनाने का सपना देखा था।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत को एक वैश्विक व्यापारिक और सैन्य शक्ति बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, इतने संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण करना बड़ी चुनौतियाँ लाता है. इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी पारदर्शिता और सख्ती के साथ पर्यावरण नियमों का पालन करती है.

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