21 साल, 10 बार शपथ और 6 बार इस्तीफा: आखिर क्यों ‘पल्टीमार’ होकर भी बिहार की सत्ता के ‘किंग’ बने रहे नीतीश कुमार?

Nitish Kumar Record : पटना/दिल्ली: बिहार की सियासत में पिछले दो दशकों से ‘धुरी’ बने रहने वाले नीतीश कुमार के एक युग का अंत होता दिख रहा है. बिहार की राजनीति के बेताज बादशाह कहे जाने वाले नीतीश कुमार अब राज्य की बागडोर छोड़कर दिल्ली की राजनीति में अपना हाथ आजमाएंगे. मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे की खबरों के बीच यह साफ हो गया है कि बिहार में अब सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदलने वाला है. 15 अप्रैल को बिहार के इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार बनने जा रही है, जहां पहली बार बीजेपी का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेगा. यह बदलाव इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि 2025 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली एनडीए सरकार को बने अभी महज पांच महीने ही बीते थे.

Nitish Kumar Record : बने बिहार की राजनीति के चाणक्य 

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र में किसी अजूबे से कम नहीं है. बीते 21 वर्षों में उन्होंने छह बार सियासी पाला बदला, लेकिन हर बार अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी को सुरक्षित रखने में कामयाब रहे. उनकी समय को पहचानने की अद्भुत कला और राजनीतिक गुणा-गणित का ही परिणाम है कि वे कभी बीजेपी के साथ रहे, तो कभी धुर विरोधी राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाई. पल्टीमार सीएम के नाम से मशहूर नीतीश कुमार के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जो शायद ही किसी और राजनेता के पास हो. उन्होंने 21 सालों में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन इसी के साथ छह बार अपने पद से इस्तीफा भी दिया.

बीते 4 साल में 4 बार लिया मुख्यमंत्री के पद की शपथ 

अगर पिछले चार सालों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो नीतीश कुमार ने हर साल शपथ लेने का एक नया सिलसिला शुरू किया था. हाल ही में 10 अप्रैल को उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली, जबकि इससे पहले नवंबर 2025 में उन्होंने 10वीम बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था. साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए का दामन थामा और जनवरी 2024 में सीएम पद की शपथ ली थी. इससे पहले 2022 में उन्होंने एनडीए से नाता तोड़कर राजद और कांग्रेस के साथ सरकार बनाई थी. यह आंकड़े गवाह हैं कि नीतीश कुमार के लिए गठबंधन बदलना महज मजबूरी नहीं, बल्कि सत्ता में बने रहने की एक सोची-समझी रणनीतिक खासियत रही है.

पहली बार साल 2000 में बने महज 7 दिन के सीएम  

नीतीश कुमार की सत्ता यात्रा साल 2000 में शुरू हुई थी, जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत न होने के कारण सात दिनों में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. 2005 में उनकी दोबारा वापसी हुई और फिर उन्होंने बिहार की सत्ता को अपने इर्द-गिर्द ऐसा समेटा कि वे राज्य की अनिवार्य जरूरत बन गए. 2013 में बीजेपी से रिश्ते टूटने और 2014 लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफा दिया, लेकिन 2015 में जीतन राम मांझी को हटाकर फिर सत्ता पर काबिज हो गए. तब से लेकर आज तक, बिहार में सत्ता के गठबंधन बदलते रहे, सहयोगी बदलते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बदला.

21 साल में कभी जेडीयू को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला  

दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार ने अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा में कभी भी अपनी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) के दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं किया. उनकी सरकार हमेशा बैसाखियों यानी गठबंधन सहयोगियों पर टिकी रही. साल 2010 में जब उनकी लहर थी, तब भी जेडीयू 115 सीटों पर अटक गई थी, जो जादुई आंकड़े से सात सीटें कम थी. उनके समर्थक इसे विपरीत परिस्थितियों में स्थिरता बनाए रखने की कला कहते हैं, वहीं आलोचक इसे जनादेश के साथ खिलवाड़ करार देते हैं. बहरहाल, नीतीश कुमार ने एक ऐसा ‘पॉलिटिकल मॉडल’ पेश किया है जहां सत्ता सिर्फ जनमत से नहीं, बल्कि सही समय पर सही गठबंधन साधने से हासिल की जाती है.

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